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पुस्तक समीक्षा : सामाजिक समरसता और हिन्दुत्व

गौरव रंजन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे बालासाहब देवरस जी के भाषणों का समायोजन इस पुस्तक में किया हुआ है। यह भाषण “सामाजिक समरसता और हिन्दू संगठन” विषय पर 8 मई 1974 को दिया गया था। इस पुस्तक में हमारी सामाजिक विषमताओं को बहुकोणीय एवं उलझनपूर्ण समस्या का अत्यंत ही सरल ढंग से सटीक विश्लेषण किया गया है। इसमें आदरणीय बालासाहेब देवरस जी द्वारा भूतकाल की पृष्ठभूमि में वर्तमान का मार्गदर्शन करते हुए भविष्य में समुचित दृष्टिकोण दिया गया है।

पुस्तक के प्रथम अध्याय से ही इसमें हिन्दू एवं इसकी व्याख्या का बड़ा ही सुंदर चित्रण किया गया है। हमारे मातृभूमि के प्रति कर्तव्य, हमारे साथ भावनात्मक आधार, व्यावहारिक पक्ष एवं एकता चिरस्थायी हो इसपर विचार करने का संदेश दिया गया है। देवरस जी ने यह भी बताया कि कुछ समुदाय राष्ट्र-जीवन के प्रवाह में समरस नही होते हैं। उनसे तर्क-सम्मत बात करने की आवश्यकता है। उन्होंने लोगों से एक कुशल संचार करने की भी अपील की है। लोगों से उचित ढंग से वार्ता करने के साथ-साथ यहां के हिन्दू समाज को दोषरहित और बलवान बनाना भी अत्यंत आवश्यक है। हमें वेदों, उपनिषदों, गीता, रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथों पर बड़ा गर्व है। लेकिन इस कोरे गर्व से इतर हमें बहुसंख्यक रहना होगा तब ही इन वेदों की प्रतिष्ठा रहेगी। नहीं तो ये केवल वाचनालयों एवं पुस्तकालयों में ही रहेंगे। आदरणीय देवरस जी ने यह बताया कि हिन्दू संगठन इस देश की राष्ट्रीय आवश्यकता है। उन्होंने इतिहास पर ज़ोर देकर कहा की जब-जब इस देश के किसी क्षेत्र में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाता है, वह हिस्सा हिंदुस्तान से कट जाता है।

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आज का अफगानिस्तान एक समय गान्धार था। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी वहींं की थी। मुसलमानों के बार-बार हमले हुए। सैकड़ों साल तक तो गान्धार का हिन्दू लड़ता रहा, परन्तु आखिरकार पराजित हो गया। वहां मुसलमानों का राज्य स्थापित हो गया। आदरणीय देवरस जी ने केवल जनता को जागरूक करने और संगठित करने में प्रयासरत रहने की बात कही है। राजनीतिक प्रयाय के नाते आने का विचार प्राथमिक नही रहता। उन्होंने प्रश्नोत्तरी काल मे संघ और भाजपा के सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भाजपा संघ का राजनीतिक मोर्चा नहीं है। दोनों संगठन पूर्णतया पृथक हैं। किंतु भाजपा का निर्माण जिस पार्श्वभूमि में हुआ उसके कारण संघ की सहानुभूति और अपनत्व उसके साथ हैं। युवाओं के विषय पर उन्होंने कहा कि संघ में युवा आकृष्ट होते जा रहे हैं। देश और समाज के लिए विद्यमान चुनौतियों को समझकर और उन्हें स्वीकार करते हुए युवा आ रहे हैं। आदरणीय देवरस जी ने सदैव अलगाववाद को रोकने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि सरकार को एक मर्यादा अवश्य ख्याल में रखनी चाहिए। वह मर्यादा यह है कि देश एकजुट व अविच्छेद्य बना रहे, उसके टुकड़े न बनें, कोई अलग होने की बात न करे, अंग्रेजी में जिसे Secession कहा जाता है वैसा कदापि न हो। यह इस देश के सरकार का प्रमुख कर्तव्य है।

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