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लेख

विश्व-भाषा की ओर अग्रसर हिंदी

14 सितम्बर 1949 को हिंदी देश की राजभाषा बनी। तबसे हिंदी ने कई उतार-चढ़ाव देखे फिर भी हिंदी देश एवं दुनिया में सतत आगे बढ़ती जा रही है। आज हिंदी केवल भारत तक सीमित नहीं है, इसका विस्तार विश्व के लगभग 130...

वरदान साबित होता अभाविप का ऋतुमति अभियान

मासिक धर्म से जुड़े हुए चुनौतियों के साथ कई तरीके की मिथक धारणाएं भी जुड़ी हुई हैं। परंतु भारत में वैदिक काल से ही रजस्वला स्त्री से संबंधित कई ऐसी रीतियां हैं जो रज महिलाओं के मान सम्मान और समाज में...

जेएनयू की जनवरी 2020 की हिंसा में छिपा है वामपंथ का असली चेहरा

जेएनयू में 3 से 5 जनवरी ,2020 के बीच घटित हिंसा एक सोची समझी साज़िश थी। वामपंथ जहां कहीं भी सत्ता में रहता है वहां लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाते हुए अधिनायकवादी तथा तानाशाही रवैए अपना लेता है। जेएनयू के...

डॉ. अंबेडकर का वामपंथी वैचारिक अपहरण

6 दिसंबर 1956 को डॉ. बाबासाहब भीमराव रामजी आंबेडकर अपनी भौतिक देह त्याग महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए और जैसा कि इतिहास में प्रत्येक महापुरुष के साथ होता है कि उनके जाने के बाद उनकी वैचारिक धरोहर और जी...

सादा जीवन उच्च विचार के प्रतीक बिंदु राजेन्द्र बाबू, जिन्होंने एक रूपये देकर अपने पोती को राष्ट्रपति भवन से भेज दिया था

भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद की जयंती पर विशेष मेधा के प्रतीक बिंदु यानी राजेन्द्र बाबू के बारे में यूं तो कई कहानियां प्रचलित है उसमें सबसे ज्यादा चर्चा उनकी सादगी पूर्ण जीवन का है। ‘साद...

NEP 2020 : HERALDING A NEW DAWN FOR THE DISABLED

“The Minister was arrogant and dismissive of our delegation when we presented our demands”, said a dejected Javed Abidi after a futile meeting with the then Minister of Human Resource Development Kapi...

गुरु नानक देव : सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता के दिव्य सूत्रधार

भारत अन्य अनेक देशों की तरह विशेष प्रकार की ऐतिहासिक और राजनीतिक परिस्थितियों से नहीं जन्मा, और न ही यह किसी राजपरिवार या समुदाय की राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रतिफल है। यह एक नैसर्गिक सांस्कृतिक-भौगोलिक...

मध्यकालीन दशगुरु परम्परा के उन्नायक श्री नानक देव जी का चिन्तन व विरासत

महाभारत के युद्ध को हुए पाँच हज़ार साल से भी ज़्यादा हो गए हैं । यह युद्ध जिसे धर्म और अधर्म के बीच युद्ध कहा जाता है , पंजाब की धरती पर ही कुरुक्षेत्र के मैदानों में हुआ था । युद्ध शुरु होने से पहले...

त्याग, समर्पण और देशप्रेम की परम प्रतीक: रानी लक्ष्मीबाई

“वह एक अकेली मर्द थी पूरी सेना में जो लड़ रही थी” ह्यूरोज का ये कथन समर्पित है वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई को – रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर, 1828 को बनारस के एक मराठी ब्राह्मण परिवा...

रानी लक्ष्मी बाई : एक संघर्ष गाथा

रानीलक्ष्मी बाई भारत के इतिहास में अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अनेकानेक सिपाहियों से लड़ते हुए एवं निडर होकर, एक वीरांगना की तरह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाली वीरांगनाओ में से एक रही है। उनके सा...

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