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छात्रशक्ति फरवरी 2020

संपादकीय

दिल्ली में एक बार पुनः अरविंद केजरीवाल भारी बहुमत से जीत हासिल कर सरकार बनाने जा रहे हैं। परिणाम आने के बाद उन्होंने टिप्पणी की कि देश की राजनीति एक नये दौर में प्रवेश कर चुकी है। कुछ हद तक यह बात सच भी मालूम होती है।

इस परिणाम में भाजपा के घोषित उद्देश्य कांग्रेस मुक्त भारत बनाने की पुनः पुष्टि हुई है वहीं अपने अप्रासंगिक होने का उत्सव मनाते हुए कांग्रेस के चिदंबरम और दिग्विजय सिंह सरीखे नेता केजरीवाल की जीत पर प्रसन्नता व्यक्त कर रहे हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के वारिस होने का दावा करने वाला राजनैतिक दल जब इस प्रकार की अघोर साधना में जुट जाये और विपक्ष की भूमिका निभाने के लिये क्षेत्रीय दलों की ओर निहारे तो सच में यह राजनीति के एक नये दौर के आने का संकेत है।

राजनीति का यह नया दौर किसी सकारात्मकता का नहीं बल्कि निष्क्रियता और नकारात्मकता की वजह से आता दिख रहा है। निहित राजनैतिक स्वार्थों के लिये राष्ट्रीय मुद्दों पर विकृत बहस चलाना और अंततः समाज में भ्रम का वातावरण तैयार कर स्वयं के अस्तित्व को दाँव पर लगा कर किसी और की उपलब्धियों पर खुद को शाबाशी देने का जो करतब कांग्रेस के नेता दिखा रहे हैं वह उनकी दयनीय मनोदशा का ही प्रमाण है।

स्थानीय चुनावों में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों के ऊपर बिजली-सड़क-पानी का सवाल हावी होता है, यह बार-बार का अनुभव है। विकास की तुलना में मुफ्तखोरी भारी पड़ती है, यह भी सिद्ध है। केजरीवाल सरकार द्वारा शिक्षा और स्वास्थ्य की सेवाओं में उल्लेखनीय वृद्धि को इस जीत का आधार बताया। किन्तु जिन इलाकों में विकास का यह दौर सबसे कम पहुंचा वहाँ आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी जीत होना इस दावे पर सवाल ही नही खड़े करता बल्कि तस्वीर के दूसरे पहलू की ओर भी देखने का अवसर देता है।

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मुस्तफाबाद और शाहीन बाग में भाजपा प्रत्याशी को किसी राउंड में पाँच और उसी मे आप प्रत्याशी को सात हजार वोट मिलना यह बताता है कि यह आंधी विकास की नहीं बल्कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर वोट बैंक की फसल काटने की रणनीतिक सफलता है। यह प्रारंभिक संकेतों के आधार पर कहा जा रहा है किन्तु चुनावी विशेषज्ञों की यह जिम्मेदारी है कि विष्लेषण में यह पैटर्न दिखाई देता है तो बुद्धिजीवी वर्ग के समक्ष इसे उठाया जाय। इसे दलगत राजनीति की गिरावट के रूप में ही नहीं बल्कि भविष्य की चुनौती के रूप में भी देखे जाने की आवश्यकता है।

सकारात्मक रूप से सोचें तो केजरीवाल की सत्ता में वापसी विकास के उन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द अपने चुनावी अभियान को केन्दित रखने के कारण हुई है जिन्हें लेकर केन्द्र की मोदी सरकार बढ़ रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सुविधाएं सामान्य नागरिकों तक पहुंचाने में दिल्ली सरकार कितना सफल रही है, यह तो पड़ताल का विषय है, किन्तु वह इसे विमर्श के केन्द्र में रखने में अवश्य सफल हुई है। केन्द्र सरकार के साथ इस मामले कोई तुलना अथवा प्रतियोगिता तो संभव नहीं है, किन्तु इन मुद्दों पर साथ कदम बढाने का तय करके विकास की गति को तेज अवश्य किया जा सकता है जो समय की माँग है।

वासंती वातावरण में आने वाले होली के पर्व को मतभेद भुला कर  नयी पहल के अवसर के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। यह राजनैतिक स्तर पर भी हो, शाहीन बाग में भी हो, कश्मीर में भी हो और जेएनयू और एएमयू में भी। अंततः हम सबकी राष्ट्रीय आकांक्षाएं एक ही हैं और आगे बढ़ने का सपना भी।

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भवदीय

संपादक

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