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पुस्तक समीक्षा : तत्वमसि

अश्वनी शर्मा

मानव सृजित परिस्थिति कोरोना वायरस की भयावह स्थिति से ईश्वर रचित यह चराचर जगत चिंतामग्न है । भारत मे इस वायरस को फैलने से रोकने के लिए माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने “जनता कर्फ्यू” यानी स्वप्रेरित नजरबंदी का आग्रह राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में किया और देश इसके लिए तैयार भी दिखा कोरोना के भय से नही बल्की अपने लोकप्रिय जननेता के प्रति विश्वास के कारण । 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के दौरान क्या क्या काम करने है जब पूरे राष्ट्र के विचारवन्त मन ,मस्तिष्क में सम्भवतः यह प्रश्न अपनी शैशवावस्था में होगा तभी एक छात्र संगठन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक क्रिएटिव मुहिम आकार लेती हुई दिखी वह मुहिम थी #ReadABookChallenge यानी जनता कर्फ्यू के दौरान एक पुस्तक पढ़ने की चुनौती ! एक विद्यार्थी का दिमाग अनेकों रचनात्मक विचारों से भरा होता है और इस मुहिम को चलाकर संकट के समय मे भी राष्ट्र को एक नई दिशा दिखाते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अपने इन असंख्य रचनात्मक मस्तिष्को से परिचय करवा दिया । इस चुनौती को स्वीकार करते हुए इस दिन मेरे कपाट में अपनी बारी का इंतजार करती पुस्तकों में से एक पुस्तक का चयन किया वह थी “तत्वमसि” !

 

पुस्तक के साथ साथ पुस्तक के लेखक का परिचय विशेष है पुस्तक के लेखक श्री ध्रुव भट्ट एक इजीनियरिंग फर्म से सेक्शन इंजीनियर के पद से सेवा निवृत है , आपने खोवायेलु नगर(1982) , अग्नि कन्या (1988), समुद्रांतिके (1993), अत्रापि (2001) जैसे पुरस्कृत उपन्यास लिखे है जिनका विविध भाषाओ में अनुवाद किया है।  मुझे इनकी जिस कृति को पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ वह कृति “तत्वमसि” साहित्य अकादमी सहित प्रतिष्ठित पांच पुरस्कारों से सम्मानित है। साथ ही विशेष बात यह है की इस उपन्यास पर “रेवा” फिल्म भी बनी जिसको हाल ही में गुजराती भाषा श्रेणी में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है।

“रेवा” गुजरात केंद्र होने के बाद बहुत बार सुनने को मिला, बहुत बार आग्रह भी रहा की रेवा फिल्म देखने के लिए जाए मन में बहुत बार लगा कि शायद यह फिल्म भी अन्य फिल्म की तरह ही मनोरंजन के लिए ही होगी, साधारण या सस्पेंस स्क्रीप्ट पर बनी होगी परन्तु मैं यहां गलत था यह पुष्टि अपने चक्षुओ से सशरीर रेवा देखने के बाद ही हो पाई फिर मन में मानव स्वभाव के अनुरूप जड़ यानी मूल स्क्रीप्ट तक जाने की अभिलाषा जगी वहीं से “तत्वमसि”को लेकर मन में निश्चय हुआ और  मेरे इस निश्चय को पूरा करने में मेरी सहायता की मेरी ही तरह इस पूर्णकालिक जीवन के सहयात्री भविष्य के अधिवक्ता नीरव भाई पंडया ने हिंदी में मुझे यह उपन्यास उपलब्ध करवा कर की और प्रधानमन्त्री मोदी जी के जनता कर्फ्यू आग्रह में अभाविप के   #ReadABookChallenge ने मुझे इसको पढने का पर्याप्त समय भी दिया ।

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‘तत्वमसि’ यह सामवेद का सार है। तत् का अर्थ है ‘वह’ और त्वम् का अर्थात् ‘तू, तुम’, असि का अर्थ है ‘हो।’ अर्थात वह तुम ही हो…. इसका पूर्ण रूप से समझ इस उपन्यास के अंत में मिलता है बहुत सुन्दर कल्पना है ……मक्के के भुट्टे को अपने हाथ में आगे करते हुए “ले खा ले” नन्ही बालिका के ये स्वर नर्मदा परिक्रमा के सबसे खतरनाक कहे जाने वाले झाड़ी क्षेत्र में गूंजते हैं कई दिनों की भूख और बुखार से तप रहे इस कृति का नायक ( पूरे उपन्यास में नायक का नाम किसी भी स्थान पर नही लिया गया है ) हाथ बढ़कर मक्के का वह भुट्टा ले लेता है स्थगित चेतना को जाग्रत करते हुए शरीर की पूरी ऊर्जा एकत्रित करते हुए पूछता है “कौन है तू ,माँ ?” ब्रह्मांड  के दूसरे सिरे से आता हुआ उत्तर  दसों दिशाओ को गुंजाता है ….. “रे…वा” यानि नर्मदा …! मौन खड़े टीलो के बीच अविरल बहता निर्मल जल … भावनाओ  …परम्पराओ…संस्कृति के समन्वय का साक्षी

भारत के विभिन्न राज्यों के वनवासी विस्तार में रहने वाले आदिवासी समुदाय अपनी परंपरा , संस्कृति को जीवन्त रखते हुए श्रद्धा के साथ जीवन जीते है इनके पर्यावरणरक्षी परम्पराओ और मान्यताओ के कारण ही इन्हें प्रकृति   पूजक भी कहा जाता है प्रकृति के सौंदर्य के संरक्षण कर्ता शायद यही इनका परिचय है इस पुस्तक में आदिवासी संस्कृति के अध्ययन के लिए एक प्रोजेक्ट के अंतर्गत प्रोफेसर रुडोल्फ इस उपन्यास के नायक का चयन करते है जो की अपने बाल्यकाल की धुंधली स्मृतियों के साथ इस प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए भारत आता है जहा अपने उद्देश्य पूर्ति के लिए वह गुजरात के वनवासी विस्तारो में अपनी ठौर बनाता है एक प्रोजेक्ट पर काम करने आया यह युवक इस उपन्यास के अंत तक ह्रदय व द्रष्टि परिवर्तन के साथ इन्ही विस्तारो में सेवा के लिए समर्पित हो जाता है। आश्रम तक पहुचने की रेल  यात्रा  के दौरान ही इस भूमि व प्रकृति के प्रति आस्था से परिचय होता है जहां नर्मदा नदी के उपर बने पुल से गुजरती इस ट्रेन में सहयात्री वृद्ध महिला अपने बटुवे से सिक्का निकाल कर नदी में डालते हुए अपने सम्बन्धी के लिए कामना करती है यूँ  नदी में सिक्के डालकर इस देश के कण कण को पूजना और आस्था रखना यही इस देश की सबसे बड़ी ताकत है जो की कभी मान्यताओ और संस्कृति के रूप में एक देश को भाषा, पंथ, जाति की विविधताओ के बाद भी एक सूत्र में पिरोकर रखती है। उपन्यास में नायक के मन में जन्म लेने वाले प्रत्येक प्रश्न का जवाब इस देश को यहां की प्राक्रतिक विरासत को देखने की एक नई दृष्टि देता है साथ ही साथ चलती आस्था और  धर्म के विषय पर गुप्ता जी और गणेश शास्री के मध्य का सम्वाद भी साधारण भाषा में बड़े प्रश्नों को समाधान का मार्ग बताता हुआ दिखता है खंड 7 में शास्त्री जी गुप्ता जी को कहते है “मैं या तुम केवल ईश्वर के भक्त है धर्म के नही ..यह पूरा देश इसी तरह जीता है”।  जीवन को देखने की जिस दृष्टि को बताया गया है उसमे संस्कृति,जीवन रीति और परम्पराओ को महत्व दिया गया है। साथ ही साथ प्राकृतिक वातावरण का वर्णन भी हृदय को आनंद से भर देने वाला किया है ऐसा ही एक स्थान है “हरिखोह” “अद्भुत, अलौकिक वनश्री से सम्पन्न हरी और हरि इन दोनों नामो को सार्थक करता अरण्य जिसमे आकर हरि यानि ईश्वर को स्मरण करने का मन हो आये “ इस प्रकार प्राकृतिक सम्पन्नता का का वर्णन किया है । पुस्तक में सभी पात्र मानो अलग अलग अनुभवो या विषयों का प्रतिनिधित्व करते है ऐसे ही गंडू फकीर जो की मुस्लिम धर्म से होकर भी नदी स्वरूप मां नर्मदा में आस्था रखते है और इस वनांचल के नीति और नियमो पर विश्वास  भी रखते है, दूसरे प्रमुख पात्रो में सुप्रिया उच्च शिक्षित है जो कि इस आदिवासी अंचल में सेवा व स्वनिर्भर बनाने के विविध प्रकल्पों का संचालन करने वाले आश्रम की मुख्य संचालिका है साथ ही साथ उन पर विदेश से आदिवासी जीवन पर अध्ययन करने आये नायक के मार्गदर्शन की भी जिम्मेदारी है एक सुलझे हुए मन के साथ सुप्रिया की निर्णय लेने की शक्ति यहां  विशेष वर्णन योग्य है । ऐसे ही इस उपन्यास में महत्वपूर्ण भूमिका है “बित्तू बंगा” की नाम से एक प्रतीत होने वाले ये दोनों भाई दो शरीर है परन्तु आत्मा ..विचार दृष्टि …सब एक ही है इस विस्तार में इन्हें सर्व ज्ञाता भी कहा जा सकता है प्रत्येक समस्या और संकट का सरल समाधान है बित्तुबंगा ! साथ ही अनेको लोक किवदंतियों के जन्मदाता भी प्रत्येक स्थान, स्थिति के बारे में पूछने पर उसके विषय से जुडी कोई इतिहास स्वरूप कहानी या कहे प्रसंग अवश्य मिलता यहां यह उल्लेख आवश्यक है की उनकी सभी बातो का वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी होता था व्यावहारिक ज्ञान के दोनों ही कुशल जानकार है ।

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चर्चा में ही महाभारत के विभिन्न पात्रो से जुड़ी जानकारी भी है बहुत बार हमें लगता है महाभारत के विषय में पढ़कर ही जानकारी मिल सकती है  किन्तु जब हम चर्चा करते है तो ध्यान में आता है की बचपन में घर के धार्मिक प्रसंगो में सहभागिता और वरिष्ठ जनों के सानिध्य से हमे बहुत सारा ज्ञान बिना पढ़े ही मिल जाता है । उपन्यास में आदिवासियों की एक जाति साठसाली के बारे में भी बताया है । उनसे जुड़े श्वानमंडल, व्याध के चित्र जो की बित्तूबंगा बखूबी बनाते है की जानकारी रोमांचक भी है और वैज्ञानिक भी ! व्याध और उनका साथी तारा एक खगोलीय घटना के अंतर्गत तारे की परिक्रमा करता है जिसकी अवधि साठ वर्ष है ।

कालेवाली मां जिन्हें इस सम्पूर्ण अरण्य में श्रद्धा भाव से माना जाता है उनका मूल नाम वनिता सुप्रिया की माता है जो की सन्यास धारण करके रानी वाली गुफा में निवास करती है जिसकी सुरक्षा साठसाली कबीला करता है । इसके साथ साथ ही इस उपन्यास में धर्म और आस्था से जुडी अपने बचपन की स्मृतियों की भी यात्रा करता है वर्षो बाद देवता नाना, नानी से जुडी यादें उसे यहा सहायता करती है समझने में जिन्हें वह अनपढ़ और अज्ञानी समझता है वह इस देश को जीवित रखने वाले आधार वर्ग से है ।

नर्मदा अपने उदगम अमरकंटक से बारह सौ मील पर्वत, वनों से सम्वाद करते हुए सागर तक अपनी यात्रा पूरी करती है।  नर्मदा के स्वरूप की तरह नर्मदा के प्रति आस्था और श्रद्धा भी उतनी ही विशाल है, उसके इस दुर्गमता से भरे पथ की परिक्रमा करके जहां एक ओर आस्था के दर्शन होते है। वहीं  साथ – साथ प्रकृति के मन भावना  स्वरूप के भी दर्शन होते है। इसके अलावे यह जानने को मिलता है परिक्रमा करने वाले परिक्रमावासियों की सेवा के माध्यम से इस परम्परा को बचाने का समर्पित प्रयास !

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यह कृति मनुष्य जीवन और संस्कृति को अपने तरीके से व्याख्यायित करती है। गुजराती भाषा के कई स्तर इस कृति में उजागर होते हैं। बोलचाल की गुजराती, लोकबोली, तत्समप्रधान भाषा…और एक ऐसी चित्रात्मकता कि आपके सामने एक के बाद एक, दृश्य पर दृश्य सब घटित होता जाता है, जैसे लेखक विज़ुअल (दृश्य) टेकनीक का सहारा ले रहा हो। नर्मदा नायक की कथा बांचती है, नायक आदिवासियों की कहानी कह रहा है, आदिवासी जंगलों की बात करते हैं…बड़े ही कौशल के साथ प्रस्तुत यह कृति अपनी शैली और कथ्य दोनों ही दृष्टियों से सही अर्थों में एक भारतीय उपन्यास है। नानी मां की कथा, बिन्ता की कथा, कालेवाली माई की परंपरा, पुरिया की कहानी, जंगल की आग, जंगल की बारिश, जंगल की चुप्पी, जंगल का शोर, जंगल के दिन और जंगल की रातें…मिलकर इस उपन्यास को सजीवता प्रदान करते है । उपन्यास के नायक के साथ इसकी सभी प्रसंगो और घटनाओ में स्वयं  के साक्षी होने की आत्मिक अनुभूति होती है ।

(लेखक अभाविप गुजरात के प्रांत संगठन मंत्री हैं।)

 

 

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