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छात्रशक्ति अक्टूबर 2022

संपादकीय

विश्व की दो महाशक्तियाँ, जिन्होंने पिछली शताब्दी में दो-दो विश्वयुद्धों से धरती को रक्तरंजित किया, दुनियाँ को एक बार फिर परमाणु युद्ध के मुहाने तक लाती दिख रही हैं। यूक्रेन को लेकर शुरू हुआ संघर्ष अब वैश्विक रूप लेता जा रहा है।

पिछली शताब्दी के युद्धों और आज की वैश्विक परिस्थिति में एक उल्लेखनीय अंतर आया है भारत की स्थिति में, जो तब पराधीन था और आज न केवल स्वतंत्र है बल्कि विश्वमत को प्रभावित करने की स्थिति में भी है। दुनियाँ को विश्वयुद्ध की आग में धकेलने पर उतारू कथित महाशक्तियों के समक्ष “यह युद्ध का युग नहीं है” कहने का साहस रखने वाला नेतृत्व आज भारत के पास है, यह संतोष का विषय है।

ऐसी आदर्श बातें कोरे उपदेश रह जाती हैं जब इन्हें कहने वाले के पास शक्ति न हो। यह सुखद संयोग है कि भारत आन्तरिक और वैश्विक, दोनों ही मोर्चों पर मजबूत आधार पर खड़ा है इसलिये उसकी बातों को सुना जाना स्वाभाविक है। शक्ति पाने के साथ ही जब कर्तव्यबोध और विवेक उसके साथ जुड़ जाता है तभी विश्वशांति और विश्वकल्याण की बातें कहने का सत्साहस जन्म लेता है। यही वह सत्साहस था जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के समक्ष बिना लाग-लपेट के बोल दिया और जिसकी प्रतिध्वनि को सारे विश्व ने सुना भी और सराहा भी।

भारत की यह भूमिका शताब्दियों से रही है। महाभारत अवश्यंभावी हो तो कर्तव्य से विचलित हुए बिना वह भी स्वीकार, लेकिन उससे पहले केवल पाँच गाँव लेकर महाभारत टालने के प्रयास का प्रसंग भी हम सबके अंतर्मन में पैठा है। यह हमें याद दिलाता है कि युद्ध विनाश ही लाता है और जहाँ तक संभव हो, संवाद के सूत्र जुड़े रहने चाहिये।

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लोककल्याण के भाव के साथ की गयी शक्तिसाधना बलवती होती है और फलवती भी। इस साधना में से विश्वशांति और लोकमंगल की कामना ही उपजती है। लेकिन इस शांति की रक्षा के लिये अपवादस्वरूप मंगलागौरी से महाकाली का रूप भी धारण करना पड़ता है। देश के भीतर देशको खोखला करने और तोड़ने के षड्यंत्र रचने वाली शक्तियाँ यदि अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करें तो उनके विरुद्ध कठोर कदम उठाना आवश्यक हो जाता है। यही पीएफआई के साथ हुआ है। भविष्य में भी ऐसी आसुरी शक्तियों के साथ यह होता रहेगा। यह अपवादस्वरूप ही है। देशविघातक परिस्थितियों से परे रहने वाला हर वर्ग, हर समुदाय भारत में निर्भय होकर सदैव से रहता आया है। रहता रहेगा।

शारदीय नवरात्रि, विजयादशमी और दीपावली शक्तिसाधना के ही पर्व हैं। इन्हें निमित्त मानकर हम इसके निहितार्थों को ग्रहण करें। भक्ति और राष्ट्रभक्ति, दोनों को साधते हुए हम सब कर्तव्यपथ पर साथ-साथ आगे बढ़े, हमारे सामूहिक प्रयास यशस्वी हों, इसी प्रार्थना के साथ,

आपका संपादक

 

 

 

 

 

 

 

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