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कश्मीर के जर्रे-जर्रे पर तिरंगा लहराना ही, श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सच्ची श्रद्धांजलि

श्रीनिवास

डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 52 साल से भी कम आयु मिली थी, लेकिन उनके कृतित्व और बलिदान ने उन्हें सदा सदा के लिए अमर बना दिया है| 5 अगस्त 2019 को जब भारतीय संसद में केंद्रीय गृह मंत्री ने जम्मू-कश्मीर राज्य से सम्बंधित अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, तब उस पूरी चर्चा के दौरान डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम की अनुगूंज से सिर्फ संसद भवन ही नहीं बल्कि सारा देश अभिभूत था| स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस अनन्य सेनानी के विचार आज देश में अपार लोकप्रियता अर्जित कर रहे हैं| मात्र 34 वर्ष की अवस्था में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति का दायित्व प्राप्त करने वाले ओजस्वी वक्ता और करिश्माई राजनेता डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राजनीति में अपने सिद्धांतों के लिए अपने जीवन की भी बलि चढ़ा देने का जो आदर्श प्रस्तुत किया है वह आने वाली अनेक पीढ़ियों तक प्रेरणा का कारक बना रहा रहेगा|

कलकत्ता के सुप्रसिद्ध परिवार में जन्में श्यामा प्रसाद जी का व्यक्तिगत जीवन शिक्षा, राजनीति और लोकसेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट सफलताओं से जड़ा हुआ था, परन्तु भारत के स्वतंत्र हो जाने के पश्चात भी एक देश में ‘दो निशान, दो विधान, दो प्रधान’ के नियम की उपस्थिति उन्हें चुभती थी| पूरे देश को जम्मू-कश्मीर के लिए अनावश्यक रूप से जोड़े गये अनुच्छेद 370 पर आपत्ति थी, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु और उनके मित्र तथा जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन ‘प्रधानमंत्री’ शेख अब्दुल्लाह के गठजोड़ और हठधर्मिता के आगे किसी का वश नहीं चल रहा था| संसद के मंच पर अद्वितीय वक्तृत्व के साथ डॉ श्यामा प्रसाद जी ने  जम्मू-कश्मीर के एकीकरण के प्रश्न को बार बार उठाया| वे तर्कों से बहसों को और लोगों के दिलों को तो जीत रहे थे लेकिन तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व से जम्मू-कश्मीर के सन्दर्भ में जो कार्यवाही अपेक्षित थी, उससे वो पीछे ही हटता चला गया| श्यामा प्रसाद जी ने नेहरु जी को अनेक पत्र लिखकर उन्हें शेख अब्दुल्लाह के ऊपर अंध विश्वास ना करने के लिए कहा| लेकिन नेहरु जी की राय को वे ना बदल सके| ऐसा माना जाता था कि कश्मीर से अपना पुराना सम्बन्ध होने के नाते नेहरु जी जम्मू- कश्मीर के विषय में किसी भी अन्य का हस्तक्षेप या राय सुनना ही नहीं चाहते थे| यहाँ तक कि भारत के 55 प्रतिशत भू-भाग (जिसपर स्वतंत्र रियासतों का शासन हो गया था) को अंग्रेजों द्वारा शासित ब्रिटिश इंडिया में मिला कर वर्तमान भारत के भूगोल को उसका रूप प्रदान करने वाले महान कूटनीतिज्ञ सरदार वल्लभभाई पटेल को भी नेहरु जी ने जम्मू-कश्मीर मसले पर हर निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा| इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता पश्चात जम्मू-कश्मीर को लेकर जो निर्णय लिए गये वे क्यों हमारे लिए सत्तर सालों तक एक बेहद दर्दनाक नासूर बने रहे|
जब तर्क और तक़रीर की भाषा से तत्कालीन शासन तस से मस नहीं हुआ तब श्यामा प्रसाद जी ने जम्मू-कश्मीर को दिए गये विशेष दर्जे में पृथकतावाद की महक के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सत्याग्रह छेड़ दिया| जम्मू-कश्मीर के भीतर प्रेम नाथ डोगरा जी के नेतृत्व में प्रजा परिषद् ने जम्मू और लद्दाख के साथ हो रहे भेदभाव का मुद्दा जोरशोर से उठाया| डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पूरे देश का दौरा किया और हर जगह इस बात को स्थापित किया कि जम्मू-कश्मीर को जबरदस्ती भारत से पृथक रखा जा रहा है और यह सिर्फ जम्मू-कश्मीर या उसके आसपास के राज्यों के हित या अहित का मुद्दा नही है बल्कि यह सम्पूर्ण देश की एकता, अखंडता और स्वाभिमान का सवाल है| उनके आह्वान पर सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, कर्णाटक और आंध्र-प्रदेश से भी सत्याग्रहियों के जत्थे भी आन्दोलन में कूद पड़े| दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब और बंगाल में तो पहले से ही अन्दोलन ने आचा खासा जोर पकड़ लिया था|
सारा देश जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ श्यामा प्रसाद जी के वक्तव्यों में उठाये गये प्रश्नों को दुहरा रहा था| ‘एक देश में दो निशान, दो प्रधान, और दो विधान- नहीं चलेगा, नहीं चलेगा’ यह नारा बच्चे बच्चे की जुबान पर चढ़ चुका था|
जिस प्रकार एक देश से दूसरे देश में जाने पर बहरी व्यक्ति को आतिथेय देश की अनुमति लेनी पड़ती है, उसी प्रकार से जम्मू-कश्मीर में भी शेख अब्दुल्लाह की सरकार ने यह व्यवस्था बना दी कि जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने पर अनुमति की आवश्यकता पड़ेगी| यह एक स्पष्ठ रूप से अलगाववादी चाल थी| लेकिन आश्चर्य का विषय यह था कि भारत की सरकार भी इस नियम को समाप्त करने में कोई रूचि नही दिखा रही थी| डॉ श्यामा प्रसाद जी ने इस नियम को मानने से इनकार कर दिया और यह घोषणा कर दी कि वे बिना परमिट प्राप्त किये जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश करेंगे|
उनका मानना था कि हमारे देश में एकल नागरिकता होने के कारण किसी भी राज्य को इस प्रकार का कानून बनाने की छूट नही है| 1947 के बाद से यह लगातार देखा गया था कि देश विभाजन के बाद पाकिस्तान की ओर से आये शरणार्थियों को जम्मू-कश्मीर, और खासकर कश्मीर में बसने नहीं दिया जा रहा था| अतः यह समझना कठिन नहीं था कि भारत की घरेलू राजनीति में कश्मीर का विषय सीधे तौर पर मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ा जा रहा है, जिसके दूरगामी परिणाम बहुत ही घातक होंगे|
डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने भविष्य के घातक खतरों को देखते हुए अपने प्राणों को जोखिम में डालने का निश्चय किया| उन्होंने शेख अब्दुल्लाह और जवाहरलाल नेहरु दोनों को ही सूचित किया कि जम्मूकश्मीर में बिना अनुमति प्रवेश करेंगे| वे 6 मई, 1953 को दिल्ली से चले| हजारों नागरिकों ने ‘भारत-कश्मीर एक हो, डॉ मुखर्जी की जय हो’ का नारा लगाया| उनका मार्ग में हर स्टेशन पर स्वागत हुआ|
कुछ लोगों को ऐसी आशा थी कि पंजाब की तत्कालीन कांग्रेस सरकार डॉ मुखर्जी को पठानकोट तक नही जाने देगी, जहाँ से होकर जम्मू में प्रवेश किया जाता है, बल्कि उन्हें पहले ही रोक लिया जायेगा| परन्तु, सरकार ने योजनाबद्ध ढंग से डॉ मुखर्जी को जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने का पूरा अवसर दिया| माधवगढ़ नामक स्थान पर जम्मू-कश्मीर राज्य की सीमा शुरू होते ही डॉ मुखर्जी ने अपने सभी सहयोगियों को लौटा दिया जिसमे श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी भी मौजूद थे| वे अकेले ही आगे बढे और सीमा में प्रवेश करते ही गिरफ्तार कर लिए गये| उन्हें बंदी बनाकर श्रीनगर की सब-जेल में रखा गया था|
डॉ मुखर्जी की गिरफ़्तारी पर सम्पूर्ण भारत में भयंकर रोष उत्पन्न हो गया| चारो ओर विरोध दिवस मनाया गया| दिल्ली में दीवान सभागार में डॉ मुखर्जी की गिरफ़्तारी का विरोध करने के लिए एकत्र हुई बुद्धिजीवियों और संभ्रांत नागरिकों की भींड पर सरकार ने लाठी-चार्ज करवा दिया था| पठानकोट, जहाँ से श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने जम्मू में प्रवेश किया था, वहां युवा सत्याग्रहियों ने ‘परमिट-तोड़’ मोर्चा बना लिया| लगभग 500 सत्याग्रहियों ने जम्मू-कश्मीर की पुलिस को चकमा देते हुए वनों और नदियों के रास्ते से जम्मू में प्रवेश प्राप्त किया|
शासन के लिए स्थिति को संभालना कठिन हो गया था| शेख अब्दुल्लाह पर भरी दबाव था| आनन-फानन में प्रधानमंत्री नेहरु श्रीनगर गये और वहां उन्होंने शेख अब्दुल्लाह से बातचीत की| इसी बीच नेहरु जी ब्रिटेन की रानी एलिजाबेथ में राज्यारोहण समारोह में शामिल होने लन्दन चले गये| बात-चीत विफल रही|
इसी बीच डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की गिरफ़्तारी को गैर कानूनी बताते हुए उनके वकील श्री रमाशंकर त्रिवेदी ने श्रीनगर उच्च न्यायलय में उनकी रिहाई की मांग की| इस मसले पर फैसला 23 जून को होने वाला था| परन्तु, 22-23  जून के मध्य की उस दुर्भाग्य पूर्ण रात्रि ने भारत माता के वीर सपूत श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी को हमसे सदा सदा के लिए दूर कर दिया| उनकी मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी| वे एक स्वस्थ्य और निरोग शरीर के स्वामी थे| उनकी मृत्यु के पीछे जो षड़यंत्र था उसपर से तत्कालीन हुक्मरानों ने पर्दा नही उठने दिया|
देश के लिए डॉ मुखर्जी की मृत्यु एक अकल्पनीय झटके के सामान थी|लेकिन, उनके  आत्म-उत्सर्ग ने हजारों लाखों देश भक्तों को प्रेरित किया| निःस्वार्थ भाव से देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए लड़ना ही हमारी सर्वोच्च आकंक्षा होनी चाहिए यह बात डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के जीवन ने इस देश की ऐतिहासिक स्मृति में सदैव के लिए अपने रक्त से चिन्हित कर दिया है|
रत्नगर्भा माँ भारती की सेवा में जब जब त्याग और बलिदान के अनुकरणीय कार्य करने की आवश्यकता पड़ती है तब तब श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे ‘नव-दधिची’ जन्म लेते है| आज जम्मू-कश्मीर भारत का निर्विवाद रूप से अभिन्न अंग है| अनुच्छेद 370 और 35 अ नाम के दूषित राजनीतिक उपकरण उठा कर इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिए गये हैं| आज 370 के निष्प्रभावी होने के बाद डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पहली पुण्यतिथि है| इस बलिदान दिवस का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि आज श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का सपना पूरा हो चुका है|
“जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है”- यह नारा हकीकत में बदल चुका है|  आने वाली पीढ़ियां इस दिव्या प्रेरणा पुरुष से प्रेरणा लेकर स्वयं को भारत माता की सेवा में अर्पित करती रहेंगी|

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(लेखक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री हैं)

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