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गांधी और आज

डॉ. जयप्रकाश सिंह

गांधी की प्रासंगिकता सनातन के बारे में हमारी समझ पर निर्भर करती है। यदि सनातन की अनुभूति एवं अभिव्यक्ति को अपरिवर्तनीय, रूढ़ और ठहरा हुआ मान लिया जाए तो गांधी की प्रासंगिकता का अलग चित्र उभरेगा। इसके उलट यदि सनातन को केवल अनुभूति के स्तर पर ही स्थिर और अभिव्यक्ति के स्तर पर गतिशील माना जाए तो गांधी की प्रासंगिकता का दायरा निश्चित रूप से अलग होगा।

गांधी के संदर्भों में सनातन की संकल्पना इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि भारतीय मनीषा का एक वर्ग समय और सनातन को विरोधी मानता है। इस वर्ग के अनुसार, सनातन अर्थात वह जो समय निरपेक्ष है, कालवाह्य है, जिसमें कभी भी बदलाव नहीं होता। दूसरा वर्ग मानता है कि सनातन का एक पक्ष कालवाह्य होता है और वह चिंतन और अनुभूति के स्तर पर काल की सीमाओं से परे होता है।

दूसरा हिस्सा काल सापेक्ष होता है। युग और समय के अनुकूल वह नए-नए रूपों में अभिव्यक्त होता है। सनातन का अन्तस स्थिर  होने के बावजूद उसका वाह्य स्वरूप नए स्वरूप धारण करता रहता है, यही सनातन का सौंदर्य है- क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैती तदेव रूपं रमणीयतायाः।

सनातन की पहली धारा स्वयं की मुक्ति तक सीमित होती है और सामाजिक स्थितियों में बदलाव लाने की कोशिश नहीं करती, और दूसरी धारा सनातन की अनुभूति के बाद उसे व्यवस्था में स्थापित करने का प्रयास करती है। वर्तमान में पहली धारा अधिक प्रभावी दिखती है, लेकिन परम्परागत रूप से सनातन की दूसरी धारा को अधिक सम्पूर्ण माना जाता है। श्रीराम और श्रीकृष्ण इसीलिए सनातन के सबसे सशक्त प्रतीक बन सके क्योंकि उन्होंने सनातन को अनुभूति के स्तर पर धारण करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि तत्कालीन परिस्थितियों में अनुकूल ढलकर, उसे व्यवस्था में उतारने का भी प्रयास किया।

भारतीय परम्परा में सनातन को सामयिक बनाने का सामर्थ्य ही सबसे बड़ा सामर्थ्य बन जाता है। सनातन को सामयिक स्वरूप देना सबसे बड़ी सृजनात्मकता और सनातन व समय के अंतःसूत्रों को पकड़ना और तदनुरूप आचरण करना ही धर्म बन जाता है।

गांधी को सनातन की दूसरी परम्परा में ही ठीक ढंग से समझा जा सकता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन सनातन को सामयिक स्वरूप देने में लगाया। सनातन और समय के बीच संवाद-सूत्र गढ़ने की कोशिश की। राजनीति के बारे  में उनका दृष्टिकोण सनातन की इसी दूसरी परम्परा पर आधारित था। वह राजनीति को एक धार्मिक कार्य के रूप में स्वीकार करते थे और यह मानते थे कि राजनीति जनसेवा का सबसे सशक्त और व्यापक प्लेटफॉर्म है।

गांधी प्रयोगों में विश्वास करते हैं, इसलिए वह हमेशा प्रवाहमान दिखते हैं। यह प्रवाह कई बार विरोधाभासों के स्वरूप में हमारे सामने उपस्थित है। मसलन असहयोग आंदोलन के दौरान वह एक छोटी सी हिंसा पर आंदोलन रोक देते हैं, लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान न केवल करो या मरो का नारा देते हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर होने वाली हिंसा पर भी मौन साध जाते हैं।

अस्पृश्यता के खिलाफ व्यापक पैमाने पर आंदोलन चलाने के बावजूद खुद को वर्ण औऱ जाति व्यवस्था का समर्थक बताते हैं। पश्चिमीकरण और मशीनीकरण का धुरविरोधी होने के बावजूद उसके प्रबल पैरोकार पं. नेहरू को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुना।

वह समाज की नब्ज को पकड़ने वाले और उसके अनुसार अपनी रणनीति तैयार करने वाले जननेता थे। इसलिए जनता की मानसिकता में होने वाले बदलावों या विरोधाभासों का असर उनकी नीतियों पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वह एकांगी संत नही थे। वह आदर्शों की बात करने के साथ उस आदर्श को जमीन पर उतारने के लिए अपनी भूमिका की तलाश भी करते थे।

उन्होनें उस समय जो राजनीतिक उपकरण तैयार किए थे, आंदोलनों की रूपरेखा गढ़ी थी, वह सनातन मान्यताओं को समय की मांग के अनुकूल ढालने के प्रयास भर माने जा सकते हैं। जैसा देश-काल उनको मिला था, जो उसके गुण-दोष थे, वह उनकी रणनीतियों में भी दिखते हैं। यदि आज का देश-काल उन्हें मिला होता, तो सनातन को सामयिक बनाने का प्रयास नए रूप में हमारे सामने आता। उस समय उन्होनें भारत में हो रहे औपनिवेशिक सभ्यतागत संहार और उत्पीड़न के खिलाफ सत्याग्रह किया था। आज वह जीवित होते तो संभवतः मीडिया के मोर्चे पर सत्याग्रह कर रहे होते। मीडिया ने खुद को जिस तरह से उपभोक्तवाद के उपकरण के रूप में तब्दील किया है, उसकी शक्तियों में जिस कदर इजाफा हुआ है और वह हमारी प्राथमिकता और पसंद को निर्धारित कर रहा है और इस शक्ति का उपयोग वह जिस तरह से उपभोग को चरम मूल्य के रूप में स्थापित करने के लिए कर रही है, वह उदात सांस्कृतिक मूल्यों को नष्ट-भ्रष्ट कर रहा है। इसे भी किसी देश का सभ्यतागत और सांस्कृतिक संहार ही माना जाना चाहिए। सभ्यता को खतरा प्लांटेड न्यूज और फेक न्यूज से भी है। इसलिए भी गांधी फेक न्यूज रैकेट के खिलाफ सत्याग्रह का आह्वान जरूर करते। आज के दौर में मीडिया के मोर्चे पर गांधी की सक्रियता सर्वाधिक होती।

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गांव और कृषि गांधी जी के प्रिय विषय रहे। कई क्षेत्रों में भारत आज उम्मीदों पर सवार है, लेकिन कृषि और गांव की हालत से कोई अच्छी उम्मीद नहीं उभरती। उनकी मानसिक बुनावट को ध्यान में रखे तो यह संभावना बनती है कि वह आज प्राकृतिक या जैविक खेती के लिए आज नए प्रयोग कर रहे होते। और संभवतः गांव और कृषि को पुनः प्रतिष्ठित करने के प्रयास में गो-पालन और गो-संवर्धन के प्रयास को वह केन्द्रीय भूमिका में रखते।

वैश्वीकरण की अबाध प्रक्रिया और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की धमक के बीच वह स्वदेशी को नए कलेवर में परोसने का प्रयास करते। एक ऐसे दौर में जब किसी उत्पाद के कल-पुर्जे कहीं और बन रहे हैं, उनकी असेम्बलिंग कहीं और हो रही है और उत्पाद बिक कहीं और रहा है, वह स्वदेशी को किस तरह परिभाषित करते यह देखना रोचक होता।

सबसे बड़ी बात यह है कि गांधी ने सभ्यताओं के मध्य समानता और संवाद की जो लाइन ली थी, उसको लेकर उनका नया नजरिया क्या होता? क्योंकि सेमेटिक पंथों में समानता और संवाद के लिए जगह ही नहीं बची है। सेमेटिक सभ्याताएं वास्तविक संवाद में विश्वास नहीं करती यह तथ्य पूरी तरह स्थापित हो चुका है। संवाद क्यों नहीं हो सकता? इसके कारण भी दुनिया के सामने अब अधिक स्पष्ट होकर आ चुके हैं। खुद को एकमात्र और अंतिम सच मानने का विश्वास समानता और संवाद की गुंजाइश ही नहीं छोड़ता। गांधी के “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम”  के राग का सकारात्मक प्रतिउत्तर न तो तब मिला था औऱ न ही आगे मिलने की संभावना है। ऐसे में गांधी सभी पंथों को समान मानने के अपने सिद्धांत में किस तरह शोधन करते, करने को तैयार भी होते कि नहीं? यह भी गांधी के आकलन का एक महत्वपूर्ण बिंदु है।

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वर्तमान स्थितियों में गांधी को अपनी एक अन्य मूल मान्यता की भी समीक्षा करनी पड़ती। आज के दौर में सत्य और अहिंसा की उनकी मूलभूत मान्यता पर भी प्रश्न उठते ही। गांधी सत्य को ईश्वर स्वरूप मानते थे। यह किसी भी सभ्यता व किसी भी चिंतन द्वारा सत्य को प्रदान की जाने वाली श्रेष्ठतम गरिमा है। लेकिन इसके साथ यह भी एक तथ्य है कि गांधी ने सत्य को अहिंसा के दायरे में बांधने की कोशिश की। उनको वही सत्य स्वीकार था, जो अहिंसा की परिधि में आता हो। वास्तविकता यह है कि सम्पूर्ण और समग्र सत्य किसी सीमा में नहीं बंध सकता। हिंसा भी एक सत्य है और उसके अस्तित्व को नकारना एक तरह से असत्य को स्वीकार करने जैसे है। प्राणियों एवं मनुष्यों के अस्तित्व के बुनावट का हिंसा एक अभिन्न हिस्सा है। इसलिए सत्य को अहिंसा की परिधि में बांधना सत्य को अपनी सुविधा के अनुसार स्वीकार करने जैसा है।

सभी सभ्यताओं को मूलभूत समान मानने, अहिंसा को सत्य के ऊपर रखने की सीमाओं के बावजूद गांधी आज भी भारत की सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए प्रस्थान बिंदु बन सकते हैं। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भाषा का प्रश्न, गोसंरक्षण, गोसंवर्धन इत्यादि भारत और भारतीयता से जुड़े मूलभूत प्रश्नों गांधी की प्रासंगिकता असंदिग्ध है। उन्हें एक दीन-हीन, आत्म-विस्मृत, आत्म विश्वास से हीन एक ऐसा समाज मिला था, जिसका निरंतर संघर्षों के कारण ओज-क्षय हुआ था। उनकी सम्पूर्ण रणनीतियां इस आत्म-विस्मृत, आत्म-अविश्वासी समाज में विश्वास भरने के लिए थी। आज वही समाज आत्म-विश्वास से लबरेज होकर इनके लचीले व्यक्तित्व का कारण पूछ रहा है तो यही गांधी की सफलता है औऱ इसी तथ्य में उनकी प्रासंगिकता भी छिपी हुई है।

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(लेखक, हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय में जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

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