e-Magazine

आपातकाल के 19 माह: जब लोकतंत्र की धारा को तानाशाही ने अवरुद्ध किया 

श्रीनिवास

भारत सनातन काल से लोकतांत्रिक राष्ट्रीयता का स्वाभाविक पोषक रहा है।भारत के प्राचीनतम कालखण्ड से लेकर आधुनिक भारत के वर्तमान तक लोकतंत्र ही भारत का मूल स्वभाव रहा  है।इसका कारण यह है कि भारत की राष्ट्रीयता सर्वसमावेशी व सर्वकल्याणकारी प्रकृति की रही है।इसलिये भारत परिप्रेक्ष्य में लोकतांत्रिक मूल्य शास्वत सत्य के जैसे है।यही कारण था कि भारत 1947 में अपनी अंग्रेजी शासन से आजादी पाने के बाद भारत एक लोकतांत्रिक व गणतन्त्र देश के रूप में सफल रहा| वहीँ भारत के आस पास ही स्वतंत्र हुए अनेक देश तानाशाही और सैन्य शासन के कुचक्र में फंस कर रह गये|

भारत मे आज़ादी के बाद स्वाभाविक रूप से कांग्रेस पार्टी को देश की जनता ने सत्ता सौंपी| देश मे लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकारों का दौर शुरू हो गया। कांग्रेस पार्टी व सरकार का नियंत्रण धीरे-धीरे नेहरू -गांधी परिवार तक सिमट कर रह गया था। कांग्रेस पार्टी के भीतर आतंरिक लोकतंत्र का पूर्ण रूप से लोप हो गया और 1970 का दशक आते आते बात यहाँ तक आ गई कि कांग्रेस के द्वारा कहा जाने लगा कि “इंदिरा इज इंडिया है”। यह लक्षण अशुभ थे| थोड़े समय में इसका परिणाम सामने आने लगा| सरकार का रवैया अलोकतांत्रिक होते होते लोकतंत्र विरोधी हो गया| इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में सरकार तानाशाही हो गयी| लोकतंत्र की प्राचीनतम पद्धति व दुनिया के सबसे बड़े और लचीले लोकतंत्र को 1970 के दशक के मध्य में ग्रहण लग गया।

गुजरात और बिहार में छात्रो द्वारा भ्र्ष्टाचार के विरोध में जन आंदोलन प्रारम्भ हो गया था।जिसके चलते पहले गुजरात और फिर बिहार के मुख्यमंत्री को अपने पद से हटना पड़ा था।यह आन्दोलन 1973 में देशव्यापी बनने लगा था| बिहार के छात्र नेताओं ने वयोवृद्ध जयप्रकाश नारायण जी को आगे आकर इस आन्दोलन का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया|

उसी समय देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी के रायबरेली से हुए निर्वाचन को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने अवैध घोषित करके निरस्त कर दिया। ‘इंदिरा ही इंडिया,इंडिया ही इंदिरा’ के अहंकार से चूर अपने विश्वश्त सलाहकारों के भरोसे श्रीमती इंदिरा ग़ांधी जी ने भारत की सनातन परंपरा लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास को कुचलने वाला निर्णय भारत पर थोंप दिया।

25 जून की मध्य रात्रि देश मे राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली अहमद को जगाकर उनसे आपातकाल लागू करने की मंजूरी ली गयी और आपातकाल घोषित कर दिया गया।बाबा साहब डॉ. भीमराव रामजी आम्बेडकर जी द्वारा संविधान प्रदत सभी नागरिक अधिकारों को समाप्त कर दिया गया।

READ  डॉ. अंबेडकर का वामपंथी वैचारिक अपहरण

अभिव्यक्ति की स्वंत्रता से लेकर बोलने व लिखने की आज़ादी छीन ली गई। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्रकारिता को प्रतिबंधित कर दिया गया। राजनीतिक, सामजिक, धार्मिक व छात्र संगठनों सब पर प्रतिबंध लगा कर उनके नेताओ को जेल में ठूंस दिया गया। आपातकाल के विरोध करने वालो को भयंकर यातनाएं दी गई।अपातकाल में दो हो लोग इन यातनाओं से बचे थे एक कांग्रेस पार्टी के नेता व इंदिरा जी के चाटुकार व दूसरे वामपंथी।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), जो कि उस समय की सबसे बड़ी वामपंथी पार्टी थी, उसने खुल कर आपातकाल का समर्थन किया था| भारत की कम्युनिस्ट पार्टी( मार्क्सवादी) ने औपचारिक रूप से आपातकाल का समर्थन तो नहीं किया लेकिन उसने आपातकाल के विरोध की किसी भी गतिविधि में हिस्सा नहीं लिया| उनके भी लगभग सभी प्रमुख नेता स्वतंत्र थे| वामपंथी बुद्धिजीवियों और पत्रकारों ने आपातकाल को न्यायसंगत सिद्ध करने के लिए तरह तरह के कुतर्क दिए और झूठ-भ्रम को फैलाया|

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को लेकर चलने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् जैसे संगठनों को इंदिरा गाँधी की तानाशाही सरकार ने विशेष रूप से अपने निशाने पर लिया|पूरे देश मे अत्याचार और अराजकता का माहौल था,पुलिस की बर्बरता चरम पर थी,मीसा लगा दिया गया था।किसी को भी कभी भी गिरफ्तार करके जेल में डाला जा सकता है।आपको आपने बचाव के कोई भी मानवीय अधिकार नही है। देखते-देखते पूरा हिंदुस्थान जेल बन गया। देशभर मे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ,जनसंघ,अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद,अन्य राजनीतिक दलों व अपातकाल का विरोध करने वालो की धरपकड़ व अत्याचार बढ़ गया। संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। फिर शुरू हुआ 19 माह का वो बर्बरता का अंतहीन सिलसिला जो कई जिंदगियों को लील गया।हजारो लोगो को अपाहिज कर गया। लाखो लोगो की जबरदस्ती नसबंदी कर दी गई।पूरा भारत ही कांग्रेस,वामपंथ व इंदिरा ने यातनाओं का घर बना दिया।इतने अत्याचारों के बाद भी भारत मे अपातकाल के खिलाफ व लोकतंत्र की बहाली के लिये संघर्ष निरन्तर चला। जैसा की पहले वर्णन हुआ कि बड़े-बड़े नेताओं को पहले ही जेलों में डाल दिया गया था। परन्तु इंदिरा गांधी से एक भूल हो गई,उसने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। वास्तव में देशव्यापी इस आंदोलन का मुख्य केंद्र संघ बन गया और देश भर मे चलने वाले आंदोलन का नेतृत्वकर्ता बना बिहार। सम्पूर्ण बिहार में छात्रो का आंदोलन जन आंदोलन बन चुका था।उसी आंदोलन का स्वरूप बदल कर आपातकाल विरोध हो गया।

जयप्रकाश नारायण जी अधिक आयु व स्वास्थ्य सही नही होने पर भी  छात्रो के आह्वान को स्वीकार किया था और उनके आन्दोलन में कूद पड़ने से उसे और तेज़ धार तथा एक चेहरा भी मिल गया था| उनके नेतृत्व में न केवल बिहार अपितु सम्पूर्ण भारत मे आंदोलन का बिगुल फूंक दिया गया।पूरा भारत अत्याचार से प्रतिकार करते हुए जेपी आंदोलन का हिस्सा बन गया।

विश्व मे जब भी लोकतंत्र को समाप्त कर ऐसी तानाशाही आई है,उसे समाप्त होने कई वर्षो लगे है।परन्तु भारत की लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करने वाली जनता ने इंदिरा गांधी की तानाशाही को 19 महीनो में धराशायी कर दिया। देश मे पुनः लोकतंत्र की बहाली हुई। 1977 में सभी राजनैतिक पार्टियों की सामूहिकता से बनी जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला। इंदिरा गांधी की चुनावों में करारी हार हुई| वे स्वयं भी रायबरेली अपना चुनाव हार गयीं| आपातकाल आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अनेक छात्र नेता उस समय केंद्रीय सरकार का हिस्सा भी बने।आज भी उनमे से अनेक राजनीतिक पार्टियों के शीर्ष स्थान पर है।

READ  बिलखती बेटियां, स्तब्ध समाज

आज जब हम आपातकाल के उस काले दौर को याद कर रहे है तब कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी मन में आ रहे है। वास्तव में जेपी जी ने उस समय “सम्पूर्ण क्रांति” का नारा देकर देश को इस आंदोलन के साथ जोड़ा था,परन्तु आगे चलकर हम देखते है कि यह महज सत्ता के हस्तांतरण का आंदोलन मात्र बन कर रह गया।आज 45 वर्ष बाद भी सम्पूर्ण क्रांति यानि व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन की बाट भारत जोह रहा है।

दूसरी बात वामपंथियों ने इंदिरा जी का साथ देकर अपनी कीमत ली थी।भारत के सविंधान की मूल आत्मा को ही विकृत कर दिया गया। आज की युवा पीढ़ी को यह जानना बहुत जरूरी है कि धर्मनिरपेक्ष(सेकुलर) और समाजवाद(सोशलिस्ट)इन दोनों शब्दो पर संविधान निर्माण समिति में बहुत व्यापक चर्चा हुई थी,और यह निर्णय हुआ था कि यह दोनों शब्दो को भारत के स्वरूप में हम नही लिखेंगे। लेकिन आपातकाल के उस अलोकतांत्रिक माहौल में इन दोनों शब्दों को एक तानाशाही के रास्ते पर चलने वाली सरकार ने तुष्टिकरण की राजनीति के चलते संविधान की प्रस्तावना में डाल दिया|

आज 45 वर्षो के बाद सविधान की मूल आत्मा विकृत रूप में ही पड़ी हुई है। आज कई डफ़ली गैंग, कुछ पत्रकार ,राजनीतिक दल यहाँ तक कि कांग्रेस भी यह आरोप लगा रही है कि सविंधान खतरे में है। देश विरोधी,सविंधान विरोधी,लोकतंत्र विरोधी ,सेना विरोधी-  ये सभी लोग मिलकर देश मे अपने तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व लोकतंत्र की रक्षा का झूठा प्रोपगेंडा चला रहे है। परन्तु देश का मानस यह समझ भी रहा है और अधिक समझने की आवश्यकता है कि देश की आज़ादी के बाद भी इस देश के हजारो लोगो ने इसी लोकतंत्र की बहाली के लिये बलिदान किये है। आज की पीढ़ी को आज के दिन यही संकल्प करना चाहिए कि देश मे फिर कोई वंशवादी, वामपंथ के पंजो में जकडी तानाशाही मनोवृति का उभार भारत मे न हो।समग्र व्यवस्था परिवर्तन का संकल्प अभी पूरा नही हुआ है,हम सब आने वाले समय मे इस क्रांति के अग्रदूत बनकर एक मजबूत लोकतंत्र व आत्मनिर्भर भारत के लिये प्राणपण से जुटें । यदि हम चाहते हैं कि हमारे लोकतांत्रिक इतिहास का उस दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय की पुर्नावृत्ति कभी ना हो तो इसके लिए हमें अपने अनुभवों से मिले सबक याद रखने होंगे| आपातकाल के गुनाहगारों को कभी ना भूलना होगा और लोकतंत्र के सेनानियों को सदैव याद रखना होगा| यही इस लोकतंत्र बचाने वालों के प्रति आज के भारत की कृतज्ञता होगी।

READ  पृथ्वी के सरंक्षण में उतनी ही गंभीरता दिखानी होगी जितनी हमने कोरोना से बचाव में दिखाई है

(लेखक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री हैं)

×
shares