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1857 की क्रान्ति की महान योद्धा, महाबीरी देवी वाल्मीकि

गजेन्द्र

भारत के इतिहास में 15 अगस्त 1947 का दिन बहुत ही ख़ास हैं। इसी दिन भारत को अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्रता मिली। गत 15 अगस्त को हर्षोल्लास के साथ देशभर में 74 वां स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। यह एक ऐसा दिन हैं जो हर भारतीय के लिए खास हैं। स्वतंत्रता दिवस के दिन उन सभी महापुरुषों को याद किया जाता हैं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति में अपनी बहुत बड़ी भूमिका निभाई। अनेकों महान पुरुषों, वीरांगनाओं ने इस आजादी की लड़ाई में जान की बाजी लगाई। यह आजादी भारत को यूँ ही नहीं मिल गयी, इस बात को प्रत्येक भारतीयों को याद रखनी चाहिए। इसके लिए अगर प्रत्येक भारतीय हमारे महान वीरो के विषय में इस दिन अध्ययन करने के लिए कुछ समय निकाले तो वह उन महान वीरो के संघर्षो से रुबरू हो सकेंगे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में 1857 की क्रान्ति को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता हैं। यह एक बहुत ही प्रभावशाली आन्दोलन था, जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी से सत्ता को हस्तान्तरित करके सीधे अंग्रेजी सरकार के हाथो में लाने को मजबूर कर दिया। इस आन्दोलन के अनेक मुख्य कारणों में से एक अंग्रेजी भारतीय सिपाहियों को दी जाने वाली बन्दूक के कारतूसो में लगा गाय व सूअर के मांस का मिश्रण था। बंदूक को लोड करते समय कारतूसों को बंदूक में लगाने हेतू मुँह का इस्तेमाल करना पड़ता था जिसके कारण हिन्दू, मुस्लिम दोनों ही समुदाय के लोगों की धार्मिक भावनायें आहत हुईं। मंगल पांडे जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी ने इस बात के कारण दो अंग्रेजी सिपाहियों पर जानलेवा हमला कर उन्हें जान से मारने की कोशिश की  जिसके कारण उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गयी। जिसका परिणाम एक क्रान्ति के रूप में उभर कर सामने आया। यह बात सही हैं की भारत को आजादी 1947 में जाकर मिली लेकिन इसकी नीवं 1857 की क्रान्ति ने रखी थी। यह सत्य हैं कि 1857 की क्रान्ति के विषय में अनेकों लेखको ने क्रान्ति में शामिल महिलाओं के बारे में लिखा हैं। नारीवादी विचारधारा के लेखको ने भी महिलाओं द्वारा इस क्रान्ति में निभाये गए कर्त्तव्य पर प्रकाश डाला हैं। इसके बावजूद हमें यह दिखाई पड़ता हैं की इस 1857 की क्रान्ति में योगदान देने वाली महिलाओं के एक वर्ग को साहित्य में उतना स्थान नहीं दिया गया जितना दिया जाना चाहिए था। उस स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में एक ऐसा भी तबका शामिल हुआ था जिसके विषय में बहुत कम लिखा गया हैं। इस तबके में उन अनुसूचित जाति की महिलाओं को शामिल किया जा सकता हैं, जिन्होंने इस लड़ाई में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और अपने प्राणों की आहुति दे दी। यद्यपि प्रोफेसर चारू गुप्ता (इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने इस वर्ग की महिलाओं के स्वतंत्रता संघर्ष पर लेख लिखे हैं, परन्तु अन्य इतिहासकारों व नारीवादियों ने इस पर अधिक प्रकाश नही डाला हैं। औपनिवेशिक कार्य के संघर्ष के संदर्भ में उच्च जाति की महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े हुए कई अध्ययन भारत मे हो चुके हैं किंतु अनुसूचित जाति की स्त्रियों का स्वंतंत्रता संघर्ष का प्रत्येक दृष्टिकोण से अध्ययन नाम मात्र ही दिखाई पड़ता हैं।

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10 मई 1857 को मेरठ में सिपाहियों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत करके भारत में आजादी का बिगुल बजा दिया। इस लड़ाई में देखते देखते कई सारे राजा महाराजा, सम्राट बहादुर शाह द्वितीय आदि शामिल हो गए। इसी लड़ाई में कई सारी अनुसूचित नायिकाओ ने भी भाग लिया जिनका योगदान अनुसूचित पुरुषों से अधिक रहा हैं। इन नायिकाओं में कौरी जाति से झलकारी बाई, पासी समाज से उदा देवी, लोधी समुदाय से अवंती बाई, गुर्जर समुदाय से आशा देवी और वाल्मीकि जाति से महाबीरी देवी आदि इन सभी अनुसूचित नायिकाओं ने राजनीतिक स्मृतियों में अपनी छाप छोड़ी हैं और सम्पूर्ण समाज के लिए बहादुरी की अदभुत मिशाले बन गयी हैं। वर्तमान समय मे अनुसूचित समाज की महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए इन पर शोध करने की जरूरत हैं, ताकि उन्हें अपने समुदाय से मार्गदर्शन मिल सके जो उन्हें सदियों से आ रही हीनबोध की भावना से बाहर निकाल सके। इसी कड़ी में 1857 की क्रान्ति में शहीद हुई महाबीरी देवी ‘वाल्मीकि’ जी का नाम लिया जा सकता हैं। महाबीरी देवी उत्तर प्रदेश के मुज्जफ्फरनगर जिले के मुंडभर नामक गाँव की रहने वाली थी। वह वाल्मिकी समाज की जाति में जन्मी थी। वह शुरू से वाल्मिकी समाज के लिए सामाजिक सुधारों पर जोर देती रही। इसी कड़ी में उन्होंने उन सामाजिक कुप्रथाओं के प्रति अपनी आवाज उठायी जो वाल्मिकी समाज में प्रचलित थी। इसमें मैला ढोने (Manual Scavenging) की कुप्रथा मुख्य हैं। उन्होंने इस कार्य (Dirty work ) को न करने के लिए एक लम्बा आन्दोलन चलाया। वाल्मिकी समाज को इज्जत के साथ जीने एवं अपने मान समान के प्रति जागरूक किया। तथा इस कार्य को  छोड़कर अन्य कार्यो में जाने की प्रार्थना की। यद्यपि महाबीरी देवी शिक्षित नहीं थी, लेकिन वह अपने समाज को लेकर बहुत जागरूक थी। वह प्रत्येक प्रकार के शोषण के खिलाफ संवेदनशील थी। समाज में वाल्मिकी समाज की सामाजिक स्थिति को लेकर वह गंभीर थी। वह वाल्मिकी समाज को सामाजिक समानता के सिद्धांत के आधार पर समानता के सूत्र में पिरोना चाहती थी। उन्होंने 22 सदस्यों को लेकर एक महिला टोली बनायी। यही से उनका सामाजिक कार्य शुरू हो गया था। इस टोली का मुख्य उद्देश्य महिलाओं व बच्चो को मैला ढोने की प्रथा के बारे में जागरूक करना था, ताकि उन्हें इस घृणित कार्य से दूर रखा जा सके तथा वाल्मिकी समाज भी मान समान के साथ अपना जीवन जी सके। जब 1857 की क्रान्ति का बिगुल बजा महाबीरी देवी भी अपनी 22 सदस्यीय टोली के साथ भारत की आजादी की लड़ाई में कूद पड़ी। इस टोली ने कई सारे अंग्रेजो को मौत की घाट उतार दिया। महाबीरी देवी अपनी अंतिम साँसों तक लडती रही जब तक उनके सभी सदस्य नही मारे गये। अंत में अंग्रेजी हुकूमत के हाथो वह मारी गयी। हमें महाबीरी देवी के योगदान को नहीं भूलना चाहिए। यह महिलाओं की स्वतंत्रता आन्दोलन की लड़ाई में भागीदारी का एक प्रतीक होने के साथ साथ अनुसूचित जाति समुदाय की महिलाओं के लिए गर्व की बात हैं, जिसे याद किया जाना चाहिए।

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(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में शोध छात्र हैं।)

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