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कब मिलेगा लावण्या को न्याय ?

तमिलनाडु के तंजावुर जिले के लावण्या मेधावी छात्रा थीं। 17 वर्षीय छात्रा लावण्या के अभिभावक कहते हैं कि उनकी बेटी होनहार थीं। सेक्रेड हर्ट्स विद्यालय में पढ़ने के लिए भेजा था, मुझे कहां पता था वहां पर पढ़ाई से ज्यादा धर्म महत्व रखता है। मेरी बेटी को बार-बार मतांतरण(conversion ) के लिए दबाव बनाया जा रहा था, हमलोगों को भी बुलाकर कहा गया था कि आपकी बेटी पढ़ने में तेज है, अगर उसकी पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं तो इसे ईसाई बनना पड़ेगा। लगातार प्रताड़ना के परेशान होकर मेरी बेटी लावण्या ने ईसाई मत में परिवर्तित होने के बजाय अपनी जान दे दी।
अजीत कुमार सिंह

लावण्या… 17 वर्षीय मासूम छात्रा, तमिलनाडु के तंजावुर जिले के सेक्रेड हर्ट मिशनरी हाई स्कूल में पढ़ती थीं, बड़ा होकर अपने मां-बाप और देश का नाम रौशन करना चाहती थीं। उसके माता-पिता ने अनेकों सपने संजोये रखे थे परंतु शिक्षा की ज्योत जगाने की दावा करने वाली ईसाई मिशनरी हाई स्कूल के धर्म के सौदागरों ने उसे लील लिया। कसूर बस इतना सा था कि वो अपने धर्म के प्रति आस्थावान थीं और ईसाई मत में परिविर्तित होने के बजाय मौत को गले लगा लिया। लावण्या पिछले पांच वर्षों से अपने स्कूल के पास सेंट माइकल गर्ल्स हॉस्टल में रह रही थीं और ईसाई मिशनरी स्कूल के ननों द्वारा लंबे समय से उन पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाया रहा था। लावण्या अपने धर्म के प्रति अडिग थीं, उसने ईसाई मत में परिवर्तन करने से साफ इनकार कर दिया।

लावण्या के विरोध से नाराज स्कूल प्रशासन ने पोंगल समारोह के लिए उनकी छुट्टी का आवेदन रद्द कर दिया। उसे स्कूल के शौचालयों की सफाई, खाना पकाने और बर्तन धोने जैसे काम करने के लिए मजबूर किया गया था। उसे तरह – तरह से प्रताड़िता किया जाने लगा। हद तो तब हो गई जब उनके परिजनों को बुलाकर सेक्रेड हर्ट हाईस्कूल के ननों ने कहा कि आपकी बेटी पढ़ने में बहुत अच्छी हैं, अगर आप अपनी बेटी की पढ़ाई आगे रखना चाहते हैं तो उसे ईसाई मत अपनाना होगा। लगातार उत्पीड़न और तरह – तरह के प्रताड़ना से तंग आकर लावण्या ने नौ जनवरी को कीटनाशक विषैला पदार्थ खा लिया। कीटनाशक जहर खाने के बाद उसकी स्थिति बिगड़ने लगी। लगातार उल्टी होने के बाद स्थानीय क्लिनिक ले जाया गया। छात्रावास के वार्डन ने उसके माता-पिता को बुलाया और उसे घर ले जाने के लिए कहा। इसके बाद लावण्या को तंजौरी के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया। उसका ईलाज आईसीयू में चल रहा था। जिंदगी और मौत से जुझ रही लावण्या को जब लगा कि अब वो नहीं बच पायेंगी, सच बोल देना चाहिए तो मरने के पहले उसने वीडियो रिकॉर्ड (मूलतः तमिल में) करवाया। अपने जीवन के अंतिम क्षण में लावण्या कहती हैं , “मैं लावण्या हूं, कक्षा 8वीं से लेकर 12 वीं तक अपने स्कूल की टॉपर थी, वो मुझे सुबह जल्दी उठकर गेट खोलने को कहती, रोज एक घंटा साथ बिठाती, छात्रावास के अकाउंट्स का काम करवाती। मैं सही करती फिर भी उसको गलत बता दोबारा करने बोलती। इस कारण से मेरा पढ़ाई से ध्यान हट रहा था। अंक कम आते जा रहे थे। पोंगल आदि त्योहारों में घर जाने नहीं दिया जा रहा था। वार्डन का कहना था कि यहीं रह कर पढ़ाई करो, इन सब बातों  की कारण तुम खुद हो, मेरा दोष सिर्फ इतना है कि मैंने ईसाई धर्म में मत परिवर्तन से इंकार कर दिया। दो वर्षों से प्रताड़ना झेलने के बाद आज थककर मैंने जहर पी लिया है।” – इन्हीं मार्मिक शब्दों के साथ लावण्या ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर लीं और बेपर्दा कर गईं मिशनरियों की कारनामों को। न जानें !  इस देश में कितने लावण्या को असमय मौत को गले लगाना पड़ता होगा।  कितने अगिनत यातनाओं को झेलना पड़ता होगा। लावण्या योद्धा थीं उसने घूटने टेकने के बजाय लड़ना उचित समझा, जीते जी उसने खुद को समर्पित नहीं किया।  जीवन के अंतिम क्षणों में भी वो भारतीय समाज को जगा गई, हालांकि उसे जिंदा रहना था। लावण्या ने अपने दर्द को समाज के बीच साझा कर दिया लेकिन अगिनत लावण्या की अंतहीन दर्द अब भी दफन है। इसी तरह की घटना 2019 में त्रिपुरा में हुई  जब ईसाई मत में जबरन मतातंरण का विरोध करने के लिए एक छात्रावास वार्डन द्वारा बेरहमी प्रताड़ित किये जाने के बाद एक 15 वर्षीय छात्र की मौत हो गई थीं।

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लावण्या की मौत ने देश की अंतर आत्मा को झकझौर दिया है। 19 जनवरी को भले को ही लावण्या, अपनी इह लीला को समाप्त कर परलोक सिधार गई लेकिन इस सभ्य के बीच अनेकों सवाल को छोड़ गई, जिसका समाधान हम सभी को मिलकर करना होगा। लावण्या की न्याय के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने देशव्यापी आंदोलन शुरू कर दिया। जिला केन्द्रों के माध्यम से राष्ट्रपति से न्याय की गुहार लगाई गई। अभाविप ने चरणबद्ध आंदोलन शुरू कर दिये, विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने तमिलनाडु के राज्यपाल को ज्ञापन सौंपकर 17 वर्षीय लावण्या को न्याय दिलाने की मांग की। दिल्ली में स्थित तमिलनाडु भवन के बाहर जोरदार प्रदर्शन किये गये, प्रदर्शन के दौरान कई कार्यकर्ताओं को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया जिसे बाद में छोड़ दिया गया। लावण्या आत्महत्या मामले में तमिलनाडु सरकार की असंवेदनशीलता इस बात से प्रदर्शित होती है कि सरकार मद्रास उच्च न्यायालय के सीबीआई जांच के आदेश के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में अर्ज़ी लगाने पहुंच गई थी। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज़ करते हुए और उच्च न्यायालय के फ़ैसले को मान्य रखते हुए, मामला सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया। न्यायालय के आदेश के बाद लावण्या के न्याय की आस जगी है।

लावण्या प्रकरण पर गौर करने पर तमिलनाडु सरकारी की भूमिका संदिग्ध लग रही है। आखिर क्या कारण है कि लावण्या की मौत के बाद बिना जांच के ही तमिलनाडु पुलिस ने कह दिया छात्रा की अपनी मां नहीं है,  सौतेली मां है, पारिवारिक तनाव से परेशान होकर आत्महत्या की होगी।  स्कूल प्रशासन को बचाने के लिए अनेकों प्रकार के तर्क गढ़े जाने लगे। हद तो तब हो गई जब स्टालिन सरकार, लावण्या के परिजनों के साथ खड़े होने के बजाय लावण्या के परिवार और उसके परिवार से सहानूभूति रखने वालों को ही प्रताड़ित करने लगा।  दिलचस्प बात यह है कि लावण्या के पिता तमिलनाडु की सत्ताधारी डीएमके पार्टी में बीते 25 वर्षों से सक्रिय सदस्य रहे हैं। आखिर स्टालिन सरकार की क्या मजबूरी है कि अपने कार्यकर्ता के पुत्री को न्याय दिलाने के बजाय मिशनरी के पक्ष में खड़ा होना पड़ा ? जिस कार्यकर्ता ने 25 सालों से डीएमके की सेवा की, उसी की पुत्री को मानसिक रूप से अस्वस्थ तक घोषित कर दिया गया। लावण्या आत्महत्या पर जिस नन को परिवार वाले दोषी बता रहे हैं वही नन जब जेल से बाहर आती है तो डीएमके के विधायक शॉल ओढ़ाकर सम्मानित करते हैं। सीबीआई को सहयोग करने के बजाय जांच के खिलाफ न्यायालय पहुंच जाते हैं। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग जब जांच करने पहुंचती है तो उसे किसी प्रकार का सहयोग नहीं किया जाता।

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14 फरवरी को तमिलनाडु पुलिस द्वारा मुख्यमंत्री आवास के बाहर शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे अभाविप कार्यकर्ताओं पर बर्बरतापूर्वक लाठी चार्ज कर गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें पहले मैरिज हॉल मंडपम ले जाया और वहां पर लंबे समय तक रखा गया। रात के 11 बजे उन्हें एसडीएम कोर्ट के सामने पेश किया, जहां पर मामले पर बहस हुई। अभाविप कार्यकर्ताओं पर दर्जनों धाराएं लगाई गई, सुनवाई साढ़े बारह बजे रात तक चली जिसके बाद अभाविप महामंत्री निधि त्रिपाठी, राष्ट्रीय मंत्री मुथु रामलिंगम, हरिकृष्णा, दक्षिण तमिलनाडु प्रांत मंत्री दक्षिण प्रांत मंत्री सुशीला समेत 33 कार्यकर्ताओं को जेल भेज दिया गया, नाबालिक होने के कारण शेष तीन कार्यकर्ताओं को छोड़ दिया गया। छात्रा कार्यकर्ताओं को सेन्ट्रल जेल भेजा गया जहां पर कुख्यात अपराधियों को रखा जाता है और छात्र कार्यकर्ता को अलग जेल में भेजा गया। परिषद के पदाधिकारियों ने कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए अदालत में अपने पक्ष प्रस्तुत अंततः सात दिन बाद महामंत्री निधि त्रिपाठी को जमानत दी गई। जमानत के बाद आये परिषद कार्यकर्ताओं का उत्साह चरम पर था। महामंत्री निधि त्रिपाठी तमिलनाडु पुलिस की बर्बरता को याद करते हुए कहतीं है कि हमारे साथ एक नाबालिक छात्रा कार्यकर्ता थीं जिसे पुलिस द्वारा घसीट कर ले जाया गया, डेढ़ घंटे तक जख्मी हालत मे रहे लेकिन पुलिस द्वारा प्राथमिक चिकित्सा तक उपलब्ध नहीं करवाया गया। तमिलनाडु पुलिस परिषद कार्यकर्ताओं के साथ अपराधियों की तरह व्यवहार कर रहे थे। हमलोगों पर सरकारी संपत्ति तोड़-फोड़, सांप्रदायिक हिंसा फैलाने की धाराएं लगाई गई, जबकि परिषद के कार्यकर्ताओं के हाथ में मात्र अभाविप का झंडा था। लावण्या की न्याय मांगना सांप्रदायिक नारा कैसे हो गया? परिषद के कार्यकर्ताओं द्वारा खरोंच तक नहीं लगाया गया है, फिर भी हमें झूठे मुकदमें में फंसाने की कुत्सित चाल चली गई। उन्होंने कहा कि स्टालिन सरकार के दमनकारी कदम से अभाविप कार्यकर्ताओं के हौसले टूटने के बजाय और अधिक बढ़ गया है । लावण्या के न्याय तक यह संघर्ष जारी रहेगा।

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