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अभाविप की वैचारिक यात्रा एवं राष्ट्रनिर्माण में इसकी भूमिका

लोकेश कुमार

आज विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्  अपना 74 वां स्थापना दिवस मना रहा  है। इस निरंतर प्रवाहमान विद्यार्थियों को संगठित करने वाले संगठन की यात्रा 9 जुलाई 1949 से प्रारंभ हुई थी, वह आज भी अनवरत निरंतर जारी है। हम सभी जानते है कि बीते 73 वर्षों में छात्र राजनीति के नाम पर अपनी राजनैतिक जमींन को भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में लाने के लिए अनेक संगठन बने, बिखरे, विलीन हुए, और फिलहाल कुछ विलुप्त होने की कगार पर भी है। लेकिन परिषद् का कारवां “चरेवेति-चरेवेति” के अपने ध्येय वाक्य के साथ में निरंतर अग्रसर हो रहा| जहाँ कुछ संगठन महज दिखावटी संघर्ष, अप्रासंगिक हो चुकी विदेशी विचारधारा में सिमटे हुए और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जद्दोजहद करते नज़र आते है,  वहीं परिषद ने ना केवल इस वैश्विक महामारी के दौर में अपना कार्य विस्तार किया है अपितु स्वामी विवेकानन्द जी का  मूल मन्त्र  “व्यक्ति निर्माण से देश निर्माण” को आत्मसात करते हुए समाज के प्रत्येक  क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है।  आज देश के किसी भी शिक्षण संसथान चाहे वह स्थान जेएनयू हो अथवा बीएचयू, कालाहांडी हो या कन्नूर, परिषद् कार्यकर्त्ता की एक विशेष पहचान है। यही पहचान ही उसे एक सूत्र में बांध कर एक लक्ष्य लेकर कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। इसी कारणवश इसे  छद्म नामों व संगठनों से जुड़े होने की आवश्यकता नही पड़ती, जैसा की वामपंथी संगठनों में हमको प्रायः देखने को मिलता है।

इस सब को देखकर आम जन-मानस समेत सभी के मन में कुछ प्रश्न उत्पन्न होते है कि ये पहचान कौन सी है? वे कौन सी बातें है, जो परिषद् कार्यकर्ता कहलाने मात्र से ही अप्रत्यक्षतः बोध हो जाता है? परिषद् अपने कार्यकर्ताओं के बीच इस एकसमान पहचान को कैसे बना लेती है? कौन से पहलु है, जो परिषद् को बाकी संगठनों से अलग करते है? जब भी हम परिषद् कार्यकर्ता होने के अनुभव से जब उपरोक्त जिज्ञासाओं को शांत करने की चेष्ठा करते है, तो कई तरह की बातें ज़हन में आती है।

नए संपर्क में आये विद्यार्थियों के लिए परिषद् की छवि शायद आन्दोलन या फिर छात्र राजनीति में सक्रिय संगठन के रूप में हो सकती है। वहीं पुराने कार्यकर्ताओं के लिए परिषद् व्यक्तित्व निर्माण की पाठशाला। लेकिन समग्रता में परिषद् को जब एक कार्यकर्ता देखता है तो सबको एक ही स्वरुप दिखाई देता है कि परिषद् छात्रहित के साथ साथ देशहित में कार्य करने वाला प्रवाहमान संगठन है। भारतीय समाज के बीच परिषद् ने एक राष्ट्रभक्त संगठन के रूप में अपनी पहचान बनाने का कार्य किया है इसी कारणवश परिषद् ने अपनी अनूठी कार्य पद्धति एवं सांगठनिक क्षमता से समाज के एक बड़े वर्ग को अपना शुभचिंतक बनाया है, जो कार्यकर्ताओं के व्यवहार, वैचारिक प्रतिबद्धतता एवं उनके रचनात्मक व आंदोलनात्मक कार्यों से बनी है।

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1949 ई से लेकर अब तक की अपनी यात्रा में परिषद् की पहचान उसके विचार, उस विचार के प्रति प्रतिबद्धता व प्रतिबद्धता के साथ किये गए कार्यों से बनी है। परिषद् ने लक्ष्य नहीं बदले, न ही संघर्षों के समय अथवा अनुकूलता की स्थिति में अपनी कार्यपद्धति से किसी भी प्रकार का समझौता किया। इसने विद्यार्थी, शिक्षक, शिक्षकेत्तर कर्मचारी सब एक परिवार के सदस्य के नाते कार्य करें, यह सोच परिषद् ने रखी, जो भारतीय संकल्पना के आधार पर शैक्षिक परिवार की व्यवहारिक व अनुकूल अवधारणा थी। बात छात्र आंदोलन की भी हुई तो ये आंदोलन विरोध के लिए विरोध करना नही बल्कि समाज परिवर्तन एवं विकास हेतु आंदोलन की बात कही गई, जो रचनात्मकता को समेटे हुई थी। एक दुसरे से लड़ाने वाली स्वार्थी राजनीति नही, राष्ट्रनीति अर्थात “देश प्रथम ” के विचार से लोक शिक्षा, लोक सेवा व लोक संघर्ष का भाव रखते हुए कार्य करना परिषद् ने तय किया।

इसने ज्ञान-शील-एकता के मूल मंत्र को न केवल आत्मसात किया बल्कि इसके लिए परिषद् ने छात्र समुदाय व संगठन के दर्शन का भी विकास किया, जिसकी जड़े भारतीयता के विचार में निहित है। “छात्र शक्ति- राष्ट्र शक्ति” हो अथवा “छात्र कल का नही आज का नागरिक है” जैसे दर्शन का विकास काफी चिंतन मनन व आधुनिक समय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए हुआ। जहाँ साम्यवादी संगठन छात्रों की रचनात्मक उर्जा का बेजा इस्तेमाल कर रहे थे, वही परिषद् ने युवा तरुणाई की उर्जा को सकारात्मक दिशा देने की ठानी और देश के सामने आनेवाली चुनौतियों के समाधान के लिए उसे साध्य बनने को प्रेरित किया। जाति, पंथ, क्षेत्र, रंग, लिंग से परे एक राष्ट्र- एक पहचान का भाव परिषद् के विचारों व कार्यों में स्पष्ट परिलक्षित होता है। परिषद् ने विश्व की प्राचीनतम सभ्यता, गौरवशाली इतिहास व श्रेष्ठ संस्कृति की पवित्र भूमि भारत को शक्तिशाली, समृद्धशाली व स्वाभिमानी राष्ट्र बनाने का संकल्प ले कार्य करने हेतु युवा मन को तैयार करने व अपनी अपनी भूमिका में इस लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में अपना योगदान हेतु प्रेरित किया।

बाबा साहेब आंबेडकर के सामाजिक समरसता  के विचार को भी परिषद ने आत्मसात किया है इसी कारण परिषद् ने “सब भारतीय है” और “सब मिलकर इस देश को महान बनाएंगे” के विचार को  लेकर समाज के हर वर्ग के बीच परिषद् कार्य का विस्तार किया  है। परिषद् ने देश के संवेदनशील मुद्दों को लेकर भी न केवल देश का ध्यान का आकृष्ट करवाया बल्कि नीति नियंताओं को भी कई फैसले लेने को मजबूर किया। चाहे असम का आन्दोलन हो या फिर आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष, बंगलादेशी घुसपैठ का विषय हो अथवा शिक्षा के व्यवसायीकरण, परिषद् ने सत्ता के जनविरोधी नीतियों, भ्रष्टाचार, राष्ट्रीय सुरक्षा के सवालों को लेकर सदैव मुखर रही है। वही दूसरी ओर नीति-निर्माण से जुड़े विषयों को लेकर संवेदनशील बनाने हेतु थिंक इंडिया, रचनात्मक कार्यों हेतु विकासार्थ विद्यार्थी, उत्तर पूर्वी राज्यों की संस्कृति से देश के बाकी हिस्सों को परिचित कराने के लिए अंतर्राज्यीय छात्र जीवन दर्शन प्रकल्प, तकनीकी विद्यार्थी के बीच टीएसविपि, मेडिकल विद्यार्थियों के बीच मेडी विजन आदि प्रकल्पों के जरिये न केवल युवा प्रतिभाओं को जोड़ा बल्कि उन्हें रचनात्मक मंच मुहैया कराकर सामाजिक जीवन जीने की एक व्यापक दृष्टि भी दी।

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हम जानते है कि इस वैश्विक महामारी के काल में विभिन्न देशों की सिर्फ राजनैतिक, आर्थिक सामाजिक व्यवस्थाओं की ही परीक्षा नहीं हुई है, अपितु मानवता के आदर्शों एवं विश्वासों का परीक्षण भी इस कालखंड में देखने को मिलता है। इस कोरोना महामारी ने विकसित एवं विकासशील सभी देशों को प्रभावित किया है लाखों की संख्या में लोग अकाल मृत्यु के कारणवश काल के गाल में समा गए और अभी भी मानव समाज अपने जीवन की सुरक्षा के लिए सघर्ष कर रहा है, लेकिन इस दौर में भी मनुष्य का आशा और मनोबल बढ़ने की कई कहानियां और किस्से हम सभी के समक्ष विभिन्न माध्यमों से आ रहे है, जिसमें नायक की भूमिका में  हमारे कोरोना योद्धा हैं, जो इस महामारी के कारणवश रास्ते में आने वाली विभिन्न बाधाओं को  दिन-रात कार्य कर दूर करने में सफल भी रहे हैं।

चूंकि CoVid-19  मानव समाज को वैश्विक रूप से शारीरिक , मानसिक अथाह दुखों को मनुष्य के समक्ष ला दिया है इसलिए आज व्यक्ति अपनी भोग-विलास  रूपी प्राथमिकताओं को त्याग कर के दैनिक उपयोग की आवश्यक चीजों को बचाने और प्रदान करने के लिए अपने संसाधनों एवम पूंजी को लगाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसी का ही परिणाम है कुछ विषयों को  छोड़ दे तो, कुछ संगठन एवं व्यक्ति भारत समेत संपूर्ण विश्व में भारतीय विचार जैसे दयालुता, प्रकृति संरक्षण, वसुधैव कुटुंबकम  के सूत्र को अपने जीवन का अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार किया है। इस परिप्रेक्ष्य में देश की राजधानी दिल्ली समेत सम्पूर्ण देश में राष्ट्रवाद की अलख जागने वाले संगठन ABVP के प्रकल्प (SFS), स्टूडेन्ट्स फॉर सेवा का में योगदान अतुलनीय रहा है, इस छात्र संगठन के सौम्य साथियों ने, पिछले वर्ष 2020 -2021 में  सामाजिक कार्यों और परोपकारी कृत्यों द्वारा इस सबसे कठिन समय में जीवित रहने की आशा को जगाया और आज भी निरंतर “सर्वप्रथम राष्ट्र” के विचार के साथ मानव सेवा में लगा हुआ  है ।

परिषद ने दिल्ली समेत भारत के लगभग प्रत्येक कोने में इस महामारी से निपटने के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए जिसमें जरुरी सुविधाओं जैसे राशन सामग्री, स्क्रीनिंग टेस्ट, सैनिटाइजेशन एवं टीकाकरण संबंधी सरकार के दिशानिर्देशों से लोगों को अवगत कराना और उनके लिए स्लॉट तय करके इस बीमारी से लड़ने में उनके लिए देवदूत के रूप में कार्य कर अपने विचारशील सेवा भाव को प्रदर्शित करने का कार्य किया  है। इसी का ही परिणाम है कि आज SFS के माध्यम से परिषद  दिल्ली समेत देश के लगभग सभी क्षेत्रों में पहुंच रही है। जैसा कि पिछले एक साल से इसके विभिन्न अभियानो के माध्यम से हमको  दिख भी रहा है, कि किस प्रकार से अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक को मूलभूत सुविधाएं पहुंचा कर, “परहित सरिस धरम नहिं भाई”  के विचार को चरितार्थ करने का कार्य कर रही है। जो धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र को  देख कर सेवा नहीं करते, अपितु समाज की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझ कर सेवा कार्य में कार्यकर्ताओं के माध्यम से इस वैश्विक संकट के दौर में लगी हुई  हैं।

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वर्ष 2020 में महामारी अपने चरम पर थी, देश में स्कूल बंद थे उस दौरान “बस्ती की पाठशाला” कार्यक्रम के माध्यम से सभी वर्गों से संबंधित छात्रों को पढ़ाने का कार्य अपने विभिन्न कार्यकर्ताओं के द्वारा किया गया। इसके साथ ही साथ कॉलेज के छात्रों को प्रवेश और परीक्षा की तैयारी के बारे में सलाह दे रही हैं साथ ही विभिन्न छात्र इस महामारी में अपने घर की आर्थिक स्थिति ठीक न हो पाने के कारणवश ज्ञान-अर्जन के लिए कहीं ना कहीं संघर्ष कर रहे थे उनको लाभ पहुंचने का काम भी  किया है।

इसके अतिरिक्त  मिशन आरोग्य जो  “सर्वे सन्तु निरामया:” सपूर्ण के ध्येय वाक्य के साथ में दिल्ली समेत सम्पूर्ण देश में चलाया जा रहा है। जिसमे प्रधानमंत्री मोदी  जी के 3T (Test, Treatment , Tressing ) मॉडल को लागू करने का सफल प्रयास किया है।  परिषद के कार्यों से ये बात साबित होती है कि इसने अपनी कार्यशैली के मधम से देश की युवा पीढ़ी को नई राह दिखाई, कई ज्वलंत समस्याओं को लेकर जनसामान्य को जागृत किया, अपनी रचनात्मक भूमिका से कई चुनौतियों से निबटने में सहायता की है । जो समाज को समर्पित व कर्तव्यनिष्ठ नागरिक गढ़ने वाले संगठन के रूप में भी कार्य करता है, जहाँ कार्यकर्त्ता देशहित जीने के विचार से जुड़ते है और आजीवन उस विचार के साए में एक भव्य और स्वामी विवेकानंद के स्वप्नों के समृद्ध भारत के संकल्प लिए अपना योगदान देने में निरंतर लगे रहते है |

(लेखक, दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती महाविद्यालय(सांध्य) में सहायक प्राध्यापक हैं एवं ये उनके निजी विचार है।)

 

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