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राष्ट्रीय अखंडता को संजोए देश की विविधता को एकता में पिरोने का प्रण है विद्यार्थी परिषद

शांभवी शुक्ला

9 जुलाई 1949 का वह दिन, भारत को स्वतंत्र हुए अभी दो वर्ष पूर्व होने को थे, तभी देश में युवाशक्ति को जागृत करने और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की संकल्पना को सार्थक अर्थ प्रदान करने हेतु ऐसे संगठन की स्थापना हुई, जो आज सात दशकों बाद और अपनी स्थापना के 74वर्ष पूर्ण कर के भी हिमालय पर्वत के शिखर के समान देश के युवाओं को सकारात्मक दिशा दे रहा है। इतने वर्षों में विद्यार्थियों की लाखों पौध आई और संगठन के विशाल वृक्ष की छाया में फली- फूली और अपने गंतव्य तक पहुंची लेकिन परिषद् निरंतर बहने वाली जनसंख्या का स्थाई संगठन बना रहा। विद्यार्थी परिषद् निरंतर बना रहने वाला छात्र संगठन है। यहां युवाओं की नई खेप जुड़ती चली जाती है लेकिन संगठन सतत साधना में लीन और सक्रिय रहता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् विद्यार्थी परिषद् की स्थापना ने सामाजिक व राजनीतिक सक्रियता और जागरूकता में छात्रों की पौध को सशक्त किया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् निरंतर युवा सोच और उनके व्यक्तित्व विकास में अग्रणी भूमिका सुनिश्चित कराने वाला संगठन है। अभाविप सदैव राष्ट्रहितों, समाज हितों और छात्रहितों के लिए कतार में सबसे आगे खड़ी रहने वाली एकमात्र संगठन है। 74 वर्षों से युवाओं के भरोसे के कारण ही इसको विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन कहा गया है।

देश में जब भी विपदा आई है, अभाविप के कार्यकर्त्ता भारत-भक्ति के साथ सेवा पथ पर आगे बढ़ते मिले हैं। समय-समय पर देश में हुए बड़े छात्र आंदोलनों में युवाओं का नेतृत्व अभाविप द्वारा हुआ है। जब भारत के सिरमौर कश्मीर में तिरंगे का अपमान हुआ तब जहां हुआ तिरंगे का अपमान वहीं करेंगे उसका सम्मान नमक व्यापक आंदोलन परिषद् ने किया। जिसमें देश भर से आई युवा तरुणायी सक्रियता से आगे आई। केरल में जब वैचारिक भिन्नता के कारण हत्याओं की श्रृंखला खड़ा करने का प्रयास किया गया तब चलो केरल रैली से देश के विद्यार्थियों ने इसका विरोध किया। अभाविप की स्थापना विद्यार्थियों की समाज और राष्ट्र के प्रति उनके कर्तव्यों का बोध कराने हेतु हुई। स्पष्ट है कि इसकी स्थापना को आज देश राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस के उपलक्ष्य में धूमधाम से मना रहा है। हम सभी जीवन भर सीखते रहते हैं लेकिन शिक्षा ग्रहण की प्रक्रिया एक निश्चित कालखंड तक ही रहती है। उस दौरान एक विद्यार्थी अनेकों आयामों के आधार पर अपनी दृष्टि बनाता है, पश्चात् अपनी वैचारिकी स्थापित कर लेता है। परिषद् सदैव विद्यार्थियों को दृष्टि देने का प्रयास करती है।

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यह ही नहीं इसके अलावा देश में आए सभी कठिन और संघर्षपूर्ण क्षणों में अभाविप लोगों का सहारा बन कर सामने आई है। बीते समय में जब देश और विश्व कोरोना नामक भयावह चीनी वायरस से जंग लग रहा है। देश की उम्मीद पुनः अभाविप की तरफ़ थी, जिसको वह पूरा करने के प्रयास में सफल रही है। पहली लहर हो या दूसरी लहर विद्यार्थी परिषद् की छात्रशक्ति ‘सेवा परमो धर्म:’ की संकल्पना को आगे बढ़ाने में दिन-रात जुटी रही। कभी भोजन व राशन वितरण, रक्तदान, लोगों की स्क्रीनिंग, ऑक्सीजन सिलेंडर पहुंचाना,कभी मास्क बनाना, वितरण करना, कभी पौधारोपण, यहां तक की देश में अलग अलग भ्रांतियों के प्रति भी लोगों को जागरूक करने का कार्य अभाविप द्वारा किया गया।

 

अभाविप विभिन्न प्रकल्पों के माध्यम से युवाओं के बीच कार्य करता है। विद्यार्थियों के लिए संचालित सभी प्रकल्पों यह उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही है। जिसमें जनजातीय छात्रों, विदेशी छात्रों, नॉर्थ ईस्ट के विद्यार्थी को भी भारत के विभिन्न हिस्सों में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों से जोड़ने का सफल प्रयास विगत वर्षों से होता आ रहा है। सेवा प्रकल्पों के माध्यम से रक्तदान, वृक्षारोपण, छात्र सम्मलेन, मेधावी छात्रों का सम्मान और उनका प्रोत्साहन, खेल प्रतियोगिता, जनजागरण के विभिन्न कार्य अभाविप द्वारा संचालित किए जाते हैं। इस प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से कतार में सबसे पीछे खड़े रहने वाले छात्र को भी समान अवसर प्राप्त होता है, जिसके द्वारा वह अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर अपना व्यक्तित्व निर्माण करता है।

देश में हुए बड़े आंदोलनों में अभाविप का नेतृत्व सर्वोपरी माना गया है। 1975 का आपातकाल और जेपी आंदोलन समकालीन भारत की एक प्रमुख घटना रही है। आपातकाल में अभाविप के कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध और प्रतिकार देश का इतिहास सदैव याद रखे है। जेपी आंदोलन में गुजरात और बिहार के युवाओं में शीर्ष नेतृत्व अभाविप द्वारा ही किया गया और उनकी प्रतिक्रिया जगजाहिर है। जिसका गहरा प्रभाव सरकार पर हुआ, जिसको दबाने के लिए सत्तारूढ़ व्यक्तियों ने आपातकाल के रूप में घिनौना षड्यंत्र रचा। इसके लिए देश उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा।

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आज जब विद्यार्थियों के मध्य विभिन्न नैरेटिव रखें जाते हैं और राष्ट्र का नवनिर्माण करने की बात आती है। ऐसे में अभाविप कहती है कि देश तो अपनी सनातनता और गौरवशाली इतिहास को धारण किए श्रेष्ठता पर आरूढ़ था। इसलिए वर्तमान स्थिति में राष्ट्रीय पुनर्निर्माण ही संकल्प होना चाहिए। राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस के अवसर पर अभाविप के इसी संकल्प को आगे बढ़ाने का प्रण लेते हुए ध्येय यात्रा के इस महान यज्ञ में हम युवा अपनी महती आहुति अर्पित करें। साथ ही संकल्प लें कि देशहित ही और भारत माता की सेवा ही हमारा प्रथम लक्ष्य होगा, जिसके प्रति हम अपने कर्तव्यों को पूरा करने में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं करेंगे। कर्त्तव्यपरायण का यह मार्ग इतना आसान नहीं होगा, हर रास्ते पर कंकण और कांटे होंगे लेकिन अभाविप की यही विशेषता है कि वह हर कठिन मार्ग से कंकण को चुनकर मार्ग को सरल बनाते हुए विद्यार्थियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। आज आवश्यकता है धैर्य, मेहनत और अपने कर्मों पर, जिसके द्वारा हम बड़े से बड़े लक्ष्य को भेद सकते हैं। महाभारत का वह प्रसंग सदैव प्रेरित करता दिखता है, जिसमें अर्जुन को मछली की आंख ही दिखाई देती है। तभी वह लक्ष्य को भेद पाते हैं। वैसे ही संघर्षों को देख कर हम युवा तरुनाई को विचलित नहीं होना चाहिए बल्कि अपने ध्येय पर डटे रहना चाहिए। जिसका मूल ज्ञान, शील और एकता से ही स्पष्ट हो सकता है।

(लेखक, मीडिया अध्यययन केन्द्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली की शोध छात्रा हैं।)

 

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