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सावित्री बाई फुले : आधुनिक युग में स्त्री – शिक्षा की सूत्रधारिणी

दुनिया के हर समाज में व्याप्त बुराइयों के विरुद्ध लड़ने के लिए समय – समय पर कुछ लोगों के उठने और संघर्ष करने के अनेक उदाहरण मिलते हैं, लेकिन उनमें से कुछ ऐसे विशेष व्यक्तित्व होते हैं जिनके द्वारा दिए गये विचारों और शुरू किये गये उपक्रमों का भावी पीढ़ियों पर बहुत गहरा असर पड़ता है। ऐसी ही एक विभूति श्रीमती सावित्री बाई फुले जी की आज 189 वीं जयंती है। समाज सुधार के लिए उनके द्वारा उठाये गये कदम न केवल उनके दौर की पृष्ठभूमि में महान थे बल्कि आज भी वे हमारे लिए प्रेरणा के स्रोत हैं और प्रासंगिक बने हुए हैं। महाराष्ट्र के सतारा जिले के नईगाँव कस्बे में कन्दोजी नवेशे पाटिल और लक्ष्मी पाटिल के घर में 3 जनवरी 1831 को जन्मी सावित्री बाई का मात्र 9 वर्ष की आयु में विवाह कर दिया गया। बाल विवाह का दुर्भाग्य तो उनके हिस्से आया लेकिन उनके पति ज्योतिबा के उदार विचारों और स्पष्ट सुधारवादी सामाजिक सोच के प्रभाव के कारण सावित्री बाई आगे चल कर अनेक महिलाओं को बाल विवाह से बचाने और उनमे शिक्षा प्राप्त करने की भूख पैदा का माध्यम बनीं। उनके पति ने पहले उन्हें पढ़ाया और बाद में अपने द्वारा खोले गये विद्यालय का संचालन उनके ही जिम्मे छोड दिया। मात्र 17 वर्ष की आयु से ही उन्होंने बड़े संघर्षमय ढ़ंग से लड़कियों की शिक्षा के लिए विद्यालय का संचालन किया। हमें यह याद रखना होगा कि यह, वह दौर था जब न केवल हमारा देश अंग्रेजों के शासन की बेड़ियों में जकड़ा था, बल्कि वह दौर भी था जब सामाजिक भ्रमों का संस्थानीकरण हो चुका था और सामाजिक सत्य को रूढियों में ही देखने की कोशिश की जाती थी। ऐसी ही एक प्रबल रूढ़ि थी कि महिलाओं को शिक्षित नहीं किया जाना चाहिए, और उनका जल्द से जल्द विवाह करके ‘बोझ’ से मुक्त हो जाना चाहिए। सावित्री बाई ने इस रुढ़िवादी सोच के विरुद्ध आवाज़ उठाई और अपने द्वारा खोले गये विद्यालय में महिलाओं की शिक्षा का इंतजाम किया। हम 19 वीं सदी के समाज के नज़रिए को देखते हुए कल्पना कर सकते हैं कि उनको किस स्तर के विरोध का सामना करना पड़ा होगा। बताया जाता है कि जब वे विद्यालय में छात्राओं को पढ़ाने जाती थीं तो उनके ऊपर पत्थर फेंके जाते थे। महिलाओं की शिक्षा की लड़ाई उन्होंने उस समय में लड़ी जब समाज जीवन मे महिला के सभी अधिकारों पर बहस करना भी कठिन था।

वास्तव में विदेशी आक्रमणों के कारण भारतीय समाज में महिलाओं के लिये बहुत सारी पाबन्दियों का समाज व्यवहार में प्रचलन बढ़ गया था। उस काल के लिए यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा कि  महिला होना ही अपने आप मे एक अपराध हो गया था।उस कालखंड में एक महिला ने उन परिस्थितियों को समझ कर एक नई क्रांति का सूत्रपात करने का संकल्प लिया । भारत की पहली महिला शिक्षक और समाज सुधारक सावित्री बाई फुले ने बीड़ा उठाया कि जब महिला को शिक्षित नहीं बनायेगे तब तक हम उसके जीवन मे परिवर्तन नहीं ला सकते। उनके इसी योगदान को देखते हुए वर्ष 2015 में पुणे विश्वविद्यालय का नामकरण सावित्रीबाई फुले के नाम पर किया। वर्ष 1998 में उनके सम्मान में उनके नाम डाक टिकट जारी किया गया था।
हम देखते हैं कि समस्याओ की चर्चा बहुत लोग करते है परन्तु वह केवल चर्चा या सवेंदना प्रकट करके ही अपना कार्य पूर्ण मान लेते है।परन्तु सावित्रीबाई फुले तो किसी ओर ही मिट्टी की बनी थी। उन्होंने उस समय के समाज मे महिला की मर्मान्तक कहानी को न केवल सुना अपितु स्वयं के जीवन मे उसकी अनुभूति भी की। मनुष्य द्वारा निर्मित भेदभाव के सभी दंशों को उन्होने झेला भी, अपने स्वयं की संघर्ष यात्रा ही वास्तव में इस शिक्षा क्रांति की वह पर्वजलित मशाल बन गई जिसके आलोक में यह महान योद्धा चल पड़ी एक नया इतिहास बनाने।
आज जब हम सोचते है कि इसमें क्या बड़ी बात है कि किसी महिला ने अगर महिलाओं के लिये शिक्षा के द्वार खोले परन्तु जब हम पलट कर भारत के उस दौर पर दृष्टिपात करते हैं तो यह कार्य बहुत ही दुष्कर प्रतीत होता है।सामाजिक जीवन मे एक उपेक्षित जाति में जन्म लेकर तथाकथित उच्च वर्णीय अधिपत्य को चुनौती देना यह बहुत ही असामान्य घटनाक्रम है।सावित्रीबाई फुले जी ने यह अनुभव किया कि महिलाओं की दुर्दशा का बहुत बड़ा कारण अज्ञानता और आत्मनिर्भर न होना है।इसलिये उन्होंने यह संकल्प किया कि शिक्षा ही एक मात्र ऐसा मार्ग है जो उनकी परिस्थितियों को बदलने का सबसे कारगर उपाय है। ज्योतिबा एवं सावित्रीबाई ने यह जीवन ध्येय लेकर कि अपने देश और समाज को सुधारने का मार्ग महिला उत्थान से ही होगा उसको ही अपना दर्शन बना लिया।सभी प्रकार के विरोध और व्यवधान के बावजूद भी उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।या यूं कहें कि हर मुसीबत या चुनौतियो को उन्होंने अपने लड़ाई का सम्बल बना लिया।देखते – देखते सावित्री बाई महिला शिक्षा की अगुआ बन गई । स्वयं का शिक्षा रूपी दीप जलाकर केवल स्वयं के अंधकार को मिटाने में नहीं अपितु ‘एक दीप से जले दूसरा दीप’ के भाव के साथ उन्होंने महिलाओं के अंधकार को हरने का कार्य किया।

आज जब हम उनकी जयंती मना रहे है तो यह बहुत प्रासंगिक हो जाता है कि हम यह चिंतन जरूर करे कि क्या सही मायने में आज आधुनिक भारत मे महिलाओं की परिस्थिति कैसी है? उसकी शिक्षा, सुरक्षा,सम्मान,स्वास्थ्य, आर्थिक आत्मनिर्भरता एवं स्वाभिमान की स्थिति कैसी है? समाज में एक महिला के लिये क्या जीवन में उन्नति करना और आत्म-विकास करना सहज है? क्या वह अपने निर्णय स्वतंत्रता के साथ कर सकती है? इन प्रश्नों को विमर्श में लाने से ही हम यह समझ पाएंगे कि समाज जीवन के सभी क्षेत्रों में महिलाओं के लिये अनुकूल वातावरण हम दे पा रहे है अथवा नहीं । शिक्षा के व्यापक अवसर तो अब निसन्देह मिल रहे हैं परन्तु क्या वह सुरक्षित होकर अपनी कल्पनाओं को साकार करने के लिये बन्धनमुक्त है?

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सही मायने में आज जब हम सावित्रीबाई जी को उनकी जयंती पर  महिला शिक्षा और उत्थान की अग्रदूत के रूप में याद कर रहे हैं तो वर्तमान में हम सावित्रीबाई से प्रेरित होने के कारण अपने आप से अपेक्षित सक्रिय भूमिका से मुक्त नहीं हो सकते।एक व्यक्ति, संगठन या समाज का हिस्सा होने के नाते महिलाओं के लिये ऐसा सकारात्मक वातावरण बनाने में सभी को अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ेगी।यह भी सत्य है कि यह परिवर्तन केवल महिला के जीवन सुधार से ही नहीं होगा बल्कि पुरुष वर्ग को भी अपने दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन करना पड़ेगा।

एक जिम्मेदार सामाजिक और छात्र संगठन होने के नाते अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अपने दायित्व को समझकर सावित्रीबाई फुले के ही कार्य को व्यवहार में उतारते हुये ‘मिशन साहसी’ जैसा अनूठा प्रकल्प समाज के सामने प्रस्तुत किया।सम्पूर्ण समाज मे महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के प्रति जागरण करते हुये लाखो छात्राओं के साथ ही छात्रो को भी इस मुहिम का हिस्सा बनाकर ‘मेकिंग ऑफ़ द फीयरलेस’ (निर्भया के निर्माण) का मार्ग प्रशस्त किया है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का मानना है कि महिला सुरक्षा या समानता यह केवल मात्र कानून का विषय नहीं है अपितु इसमें सबसे बड़ी भूमिका समाज की है।यानी पुरुष वर्ग को आगे आना ही पड़ेगा क्योंकि अगर हम आज सावित्रीबाई जी के कार्य को आदर्श के रूप में देख रहे है तो यह बात अनदेखी नहीं कर सकते कि उनको पढ़ाने वाले उनके पति ने धारा के विपरीत चलने का जोखिम भरा साहसिक निर्णय लिया था। निश्चित ही उनको समाज की उस समय  की स्थापित मान्यताओं से भी टकराना पड़ा होगा और स्वयं के जीवन मे बहुत सारे  त्याग करने पड़े होंगे।तभी जाकर एक महिला के शिक्षिका बनने की राह आसान हुई होगी।

आज सावित्रीबाई फुले जी की जयंती पर हम उनको नमन करते हुये उनके जीवन से प्रेरणा लेकर महिलाओं को  आगे बढ़ने के समान अवसर प्रदान करने के लिये एक सकारात्मक वातावरण तैयार करे। इतिहास साक्षी है कि जब भी नेतृत्व भारतीय नारी के हाथ में आया है तो हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का मान सम्मान बढ़ा ही है। भारत के विकास और उसकी सर्वांगीण समृधि का मार्ग स्त्री की समृधि और विकास से ही संभव है। आइए एक मन्त्रदृष्टा महिला शिक्षा की अग्रदूत पूज्य सावित्रीबाई फुले की जयंती पर अब्दुल कलाम जी के विजन के भारत का स्वप्न पूरा करने के लिये प्राणपन से जुट जाएं।
(लेखक अभाविप के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री हैं।)

 

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