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सरलता, सहजता और सौम्यता की मूर्ति डा.राजेंद्र बाबू

राजेंद्र प्रसाद जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कोई सामान्य सेनानी नहीं थे, वे व्यापक जनाधार वाले राष्ट्रीय नेता थे जो शहरी-ग्रामीण, पढ़ा-लिखा – अनपढ़, अमीर-गरीब के सभी विभाजनों को पार करते हुए जन सामान्य के लिए स्वीकार्य व्यक्तित्व थे। वे भारतीय समाज के साथ उसके  देशीपने में भी उतने ही सहज थे जितने की विदेशी अंग्रेजों के साथ वार्ता के टेबल पर।
श्रीनिवास

पुण्यतिथि विशेष

सरलता, सहजता और सौम्यता की मूर्ति डा.राजेंद्र प्रसाद जी हमारे देश के पहले राष्ट्रपति थे। दुर्भाग्य से, देश में विमर्श की मुख्यधारा में उनका यही संक्षिप्त परिचय पर्याप्त माना जाता है। राजेंद्र बाबू के व्यक्तित्व और उनकी महानता के ढेर सारे पहलुओं को लगभग जानबूझकर सुनियोजित राजनीतिक कारणों से सामने नहीं लाया गया। आज उनकी जयंती के अवसर पर जब देश का युवा यह विचार करता है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरु जी और दूसरे राष्ट्रपति रहे एस.राधाकृष्णन जी की जयंती को क्रमश: बाल दिवस और शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है तो अतुलनीय मेघा के धनी राजेंद्र बाबू की जयंती और पुण्यतिथि को इतना मान क्यों नहीं दिया गया? वह यह भी विचार करता है कि कैसे देश के उपरोक्त दोनों विभूतियों को राजेंद्र बाबू की वरिष्ठता और कद के बावजूद भी उनसे 9 साल पहले भारत रत्न दिया गया? यह सब प्रश्न आज के दौर में उठने लगे हैं। अतः यह बहुत आवश्यक हो गया है कि राजेंद्र प्रसाद जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के उन पहुलओं को सामने लाया जाये जो कमोबेश दबाये गये।

राजेंद्र प्रसाद जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कोई सामान्य सेनानी नहीं थे, वे व्यापक जनाधार वाले राष्ट्रीय नेता थे जो शहरी-ग्रामीण, पढ़ा-लिखा – अनपढ़, अमीर-गरीब के सभी विभाजनों को पार करते हुए जन सामान्य के लिए स्वीकार्य व्यक्तित्व थे। वे भारतीय समाज के साथ उसके  देशीपने में भी उतने ही सहज थे जितने की विदेशी अंग्रेजों के साथ वार्ता के टेबल पर। गाँधी जी के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर एक त्यागी सत्याग्रही होना और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के सर्वोच्च पद से राज-काज चलाना दोनों उनके लिए समान रूप से सुग्राह्य था। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उनके मन में गहरा संस्कृति-बोध और अप्रतिम देश प्रेम का होना था। उनके संस्कृति-बोध का परिचय हमें उनके अनेक कार्यों और कथनों से होता है। एक अत्यंत मेधावी छात्र, एक सफल वकील, लेखक, एक अप्रतिम सेनानी, संविधान सभा के अध्यक्ष और एक सफल राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने हमारे लिए विशेष उपलब्धियां अर्जित कीं।

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वर्ष 1951 का वह वाकया बहुत प्रसिद्ध है जिसमे राजेंद्र बाबू ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल के मना करने के बाद भी नवनिर्मित सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन एवं पूजन किया। पश्चिमी सेकुलरवाद की जिस दृष्टी से नेहरु भारतीय समाज को देखते थे, उसके अनुसार राष्ट्रपति का किसी मंदिर में जाना देश की धर्म-निरपेक्षता में कमी कर देता। और वह मंदिर भी सोमनाथ हो! जिसका विध्वंस  इस्लामिक आक्रान्ताओं की बर्बरता की सबसे प्रमुख निशानी हो। लेकिन राजेंद्र बाबू ने विशुद्ध राजनीतिक निर्देशों के ऊपर संस्कृतिवादी निष्ठाओं को सदैव वरीयता दी थी, क्यों कि उनका मानना था कि राजनीति हमेशा संस्कृति की अनुवर्ती ही होनी चाहिए। उनको मालूम था कि विगत 800 वर्षों में विदेशी आक्रान्ताओं ने भारत के धार्मिक-सांस्कृतिक नाभिकेन्द्रों जैसे कि सोमनाथ मंदिर और रामजन्मभूमि मंदिर आदि पर निर्मम आक्रमण करके भारतीय समाज के मनोबल को तोड़ा है। अतः 1947 में भारतीय हाथों में सत्ता आने के बाद समाज के आत्म-विश्वास को ऊपर उठाने के लिए गुलामी के दौर के सांस्कृतिक विध्वंस को उलटना बेहद जरुरी था। इसलिए प्रधानमंत्री के मना करने के बावजूद भी, मतभेद मोल लेकर राजेंद्र बाबू सोमनाथ गये और वहां उन्होंने सरदार पटेल की पहल पर के.एम्.मुंशी जी द्वारा पुनः बनवाए गये सोमनाथ मंदिर में विधिवत पूजन भी किया। राजेंद्र बाबू एक कांग्रेस नेता थे, और कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व से ही राष्ट्रपति बने थे, लेकिन राजनीतिक हानि का ध्यान न करते हुए, उन्होंने यही दिखाया कि राष्ट्र के लिए जो उचित है वह किसी भी कीमत पर किया जाना चाहिए।

बीते 9 नवम्बर को जब 70 वर्षों तक चली क़ानूनी लड़ाई के बाद उच्चतम न्यायलय के जजों की बेंच ने एकमत से रामजन्म भूमि स्थल पर मंदिर बनाने का फैसला दिया। जिसे पूरे देश ने बड़ी ही परिपक्वता से स्वीकार किया है, सराहा है और एक समाज के रूप में इसे उपलब्धि माना है। इस अवसर पर राजेंद्र प्रसाद जी का योगदान नहीं भूलना चाहिए। 1951 में सोमनाथ मंदिर के पक्ष में मजबूती से वे खड़े हुए, उससे नेहरूवादी सेकुलरवाद के सामने जिस वैचारिक धारा को चुनौती के रूप में उन्होंने स्थापित किया वही आज जनसामान्य में प्रचलित होती चली जा रही है, और पश्चिमी सेकुलरवाद को समाज ने नकार दिया है। तब का सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण और आज का राममंदिर निर्माण दोनों ही हमारे राष्ट्रपुरुष की सांस्कृतिक नसों में नए रक्त के संचार का प्रतीक हैं।

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संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में राजेंद्र प्रसाद जी ने भारतीय संविधान के निर्माण में विशेष भूमिका निभाई। उनकी गहरी सामाजिक समझ और धर्मशास्त्रों- स्मृतियों को पढ़कर उनसे कानून के तत्वों को निकालने की क्षमता ने हमारे संविधान को एक आवश्यक सांस्कृतिक पुट दिया। संविधान की मूल पांडुलिपियों पर राम, कृष्ण और बुद्ध के जीवन से जुड़े चित्र उकेरवा कर राजेन्द्र बाबू ने संविधान को एक सांस्कृतिक सन्दर्भ में स्थापित किया। वह राजेंद्र प्रसाद जी ही थे जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि वन्दे मातरम को भी राष्ट्र-गान जैसा ही सम्मान मिले।

कांग्रेस ने आज़ादी के बाद राजनीतिक संकीर्णताओं के लिए अनेक बार सांस्कृतिक सत्य दबाये हैं। जो संगठन वोट की राजनीति के लिए अपने अधिवेशनों में वन्दे मातरम का गान रोक सकता है उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि राजेंद्र बाबू जैसे प्रखर व्यक्तित्व को प्रमुखता दे। कांग्रेस ने सदैव कुछ ही लोगों को महान साबित करने के लिए , जो कमोबेश एक ही परिवार से थे, हमेशा राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री और सरदार पटेल जैसी राष्ट्रवादी विभूतियों को नेपथ्य में धकेला है। एक ही परिवार को बढ़ावा देने की सोच ने कांग्रेस को प्रेरित किया कि वह स्वतंत्रता संग्राम के पूरे इतिहास को ही कुछ लोगों की उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करे।कांग्रेस-तंत्र ने यथा शक्ति ऐसा किया भी। लेकिन राजेंद्र प्रसाद जी जैसे लोग जिन्होंने देश के लिए अपने परिवार के बारे में नहीं सोचा, वे एक परिवार के खातिर देश के बारे में नहीं सोचने वालों से सदैव नहीं छले जा सकते। आज का युवा इस ऐतिहासिक अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने लगा है। वह यह मांग करने लगा कि राजेंद्र बाबू के साथ अन्याय क्यों हुए? क्यों एक राष्ट्रपति को कार्यकाल समाप्त होने के बाद पटना के सदाकत आश्रम में रहना पड़ता है, जहाँ राजेंद्र बाबू के इलाज का उचित प्रबंध भी नहीं था। क्यों राजेंद्र बाबू के निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री और उनके पुराने मित्र श्री नेहरु अन्त्योष्टि तक में शामिल नहीं हुए?

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अब समय आ गया कि आज़ादी के बाद और उसके पहले के भी इतिहास ही निरपेक्ष समालोचना की जाये। स्वंय राजेंद्र प्रसाद जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘इंडिया डिवाइडेड’ (भारत विभाजन), जो कि 1946 में छपी, हमारे स्वतंत्रता संघर्ष का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रमाणिक दस्तावेज है। परन्तु, ऐसी पुस्तकें जो विदेशी दृष्टी से लिखी गयी हैं और यह मानती हैं कि भारत को किसी ने खोजा है! उन्हें हमेशा हमारे वामपंथ प्रभावित अकादमिकों ने प्रमाणिक कार्यों के ऊपर वरीयता दी है। अतः यदि सत्य को सामने लाना है तो आज की तारीख में उपलब्ध दस्तावेजों को पढ़ा जाये और शोध के माध्यम से ऐसा प्रयास किया जाये कि सबके योगदान को समुचित सम्मान देते हुए वैकल्पिक इतिहास गढ़ा जाये हमारा ताकि भविष्य सत्य की बुनियाद पर टिका हो। जिस सांस्कृतिक और राष्ट्र के लिए राजेंद्र प्रसाद जी ने जीवन पर्यंत संघर्ष किया उसकी सेवा में ही इस महान सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधा को सच्ची श्रद्धांजलि है।

(लेखक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री हैं)

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