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पुस्तक समीक्षा : पराक्रम

अंकित शुक्ला

वैसे तो सैनिकों के संघर्ष के बारे में बहुत समय से सुनता,समझता आया हूँ,कई घटनाओं ने प्रेरणा दी तो साथ ही ऊर्जा भी। “पराक्रम” में ऐसी ही प्रेरक घटनाओं का मानो लेखक ने सजीव चित्रण कर दिया है। पुस्तक में हमले के दौरान की स्थिति का वर्णन करते हुए लेखक ने लिखा कि तोलोलिंग की चोटी पर बीस दिन से भारतीय जवान शहीद हो रहे थे। आखिरी हमले की रात वे दुश्मन के बंकर के बेहद करीब पहुंच गए लेकिन तभी गोलियों की बौछार हो गई। वे घायल थे, लेकिन वापसी उन्हें मंजूर नहीं थी। शरीर से बहते रक्त की परवाह किए बिना उन्होंने एक ग्रेनेड दागा और कारगिल में भारत को पहली जीत मिल गई। उसके सामने 100 चीनी सिपाही खड़े थे, गिनती की गोलियां बची थीं; लेकिन मातृभूमि का कर्ज चुकाते वक्त उसके हाथ नहीं कांपे और उसने युद्ध के मैदान को दुश्मन सिपाहियों का कब्रिस्तान बना दिया।

ये भारतीय सेना की वे युद्ध गाथाएं हैं, जो आप शायद आज तक नहीं जान पाए होंगे। रणभूमि में कान के पास से निकलती गोलियां जो सरसराहट पैदा करती हैं; ऐसी प्रेरक घटनाएं,रोमांच व शौर्य वर्णन से जिन्हें हम सुनते समय कहानियां भी समझ सकते हैं इस पुस्तक में है।बडगाम में मेजर सोमनाथ शर्मा की कंपनी ने कैसे श्रीनगर को बचाया और सियाचिन में पाकिस्तान के किले को किसने ढहाया; इस पराक्रम के हर पल का विवरण यह किताब देती है।

सन् 1947 से लेकर करगिल तक भारतीय सैनिकों की वीरता की ये वे सच्ची कहानियां हैं; जो बताती हैं कि विपरीत हालात के बावजूद कैसे अपने प्राणों की परवाह किए बिना हमारे सैनिकों ने अदम्य साहस और शौर्य दिखाया। यह उस पराक्रम की झलक है; जो युद्धभूमि में दिखा और आज इस पुस्तक के जरिए आप तक पहुंच रहा है।

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भारतीय जांबाजों के शौर्य, साहस, निडरता और राष्ट्रप्रेम का जीवंत प्रमाण है यह कृति ‘पराक्रम’ जो युवा पीढ़ी को न केवल प्रेरित करेगी बल्कि भारतीय सैनिकों के समर्पण के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक कर देगी।

(समीक्षक अभाविप अवध प्रांत के प्रदेश मंत्री हैं।)

 

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