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कविता : कलम का चमत्कार

कलम का चमत्कार

शांतचित्त पढ़ी रहती मेज पर वो कलम यहां वहां।

कोई आता और ले जाता उसे अपने साथ,

कभी उत्तर पुस्तिका में उत्तरों को ढालती,

तो कभी सफलता को अमिट आटोग्राफ बनाती।

कभी वो किसान की बेटी को अफसर बनाती,

तो कभी गरीबों के लिए कागजी योजना बनाती।

एक दिन कलम के जीवन में आया परिवर्तन,

जब पड़ी एक लड़की की उस पर नजर,

सजने वाली थी जिसके हांथो में कभी मेहंदी।

कलम देखकर उसके मन में उमड़े नये विचार,

ढालना चाहा उसने लिखावट में उसके विचार।

लिया हांथ में कलम पिरोने लगी शब्दों की माला।

धीरे धीरे माला कागज पर बढ़ने लगी थी,

विचारों की माला ने लिया काव्य रूपी नया जन्म।

जिन हाथों में लगने वाली थी कुछ सालों में मेहंदी,

वे अब विचारों की शब्दरूपी माला पिरोने लगे थे।

कलम का हुआ चमत्कार विचारों का बना काव्य,

जो थी पूरे परिवार के लिए एक लड़की,

साहित्य जगत में अब कवयित्री कहलाने लगी है।

‘ – ‘प्रद्युम्न सिंह रघुवंशी”

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