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जेएनयू हिंसा: दुर्घटना नही, एक प्रायोजित षड़यंत्र

सुजीत शर्मा

देश के प्रतिष्ठित और चर्चित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय 5 जनवरी की हिंसक घटना के बाद एकबार फिर सुर्खियों मे है। मीडिया, शिक्षा, राजनीति और अब बॉलीवुड जगत में भी जेएनयू, चर्चा और बहस का विषय बना हुआ है। वैसे तो जेएनयू की राजनैतिक और वैचारिक विरोध की राजनीति का एक लम्बा इतिहास रहा है और कई बार वो विरोध हिंसक भी हुआ परन्तु वर्तमान घटना सचमुच अप्रत्याशित और चिंतनीय है।

रविवार (5 जनवरी) को हुई हिंसा जेएनयू मे चल रहे प्रदर्शन की ही परिणति है। इसके पूरे घटनाक्रम को समझने से इसके पीछे छिपी मंशा को जानना जरूरी है तभी आप दोषियों तक आसानी से पहुंच पायेंगे । लगभग 70 दिनों से हॉस्टल मैन्युअल को लेकर कैंपस मे जो प्रदर्शन जारी है, उसमें कई ऐसे अवसर आये जब प्रदर्शनकारी संगठनों और सामान्य छात्रों के बीच हित टकराव की वजह से हाथापाई और गाली-गलौज तक की नौबत भी आयी लेकिन बात यहीं तक दब गयी। परन्तु शुक्रवार के दोपहर से ही प्रदर्शनकारियों ने एक ऐसा रूप बदला जो जेएनयू इतिहास में शायद पहली बार था। प्रदर्शनकारियों ने चेहरे पर नकाब लगाकर प्रदर्शन शुरु किया, जो स्पष्ट करता है की प्रदर्शनकारियों को खुद भी इस बात का अहसास था की वो जो भी कर रहे हैं वह अनैतिक और गैर-कानूनी है। जिसकी वजह से उन्हे अपनी पहचान छिपानी पड़ रही है। रजिस्ट्रेशन करने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या को देख और उन्हें समझा न सकने की असमर्थता से आहत ‘वामी गैंग’ ने नकाब पहनकर सर्वर रुम मे घुसकर, वाई-फाई सिस्टम को ध्वस्त कर, अकादमिक भवन, लाइब्रेरी और आवासीय क्षेत्रों सहित पूरे कैंपस की इंटरनेट सुविधा ठप कर दिया। इसी दौरान ‘नकाबधारी प्रदर्शनकारियों’ ने सेमेस्टर रजिस्ट्रेशन के लिये जा रहे अभाविप कार्यकर्ताओं और अन्य सामान्य छात्रों के साथ मारपीट भी की, उनके फॉर्म और मोबाइल भी छीन लिये।

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अपने आन्दोलन से सामान्य छात्रों के घटते विश्वास और इतने लम्बे आन्दोलन को अपने हाथ से निकलता समझकर यूनियन पर काबिज एसएफआई और आईसा ने उन स्टूडेंट्स को टारगेट करना शुरु किया जो रजिस्ट्रेशन कराने की कोशिश कर रहे थे, जाहिर सी बात है की इसमे अधिकांश सामान्य छात्र और परिषद के कार्यकर्ता थे। उन सभी छात्रों को सबक सिखाने के लिये 250 – 300 प्रदर्शनकारियों का एक मॉब सबसे पहले पेरियार हॉस्टल पर धावा बोलता है। इस मॉब का नेतृत्व कर रही छात्रसंघ अध्यक्ष आयशी घोष के इशारे पर एक-एक करके कई अभाविप कार्यकर्ताओं को पीटा गया। ये घटना है रविवार की दोपहर 2:30 – 3:00 बजे की है, पहली पुलिस कॉल तभी की गयी थी। पेरियार के बाद मॉब का अगला निशाना बना साबरमती हॉस्टल जहाँ नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने ABVP कार्यकर्ताओ के कमरों-खिड़कियों को तोड़ा और लोग किसी तरह भाग कर जान बचा सके। ये बात सनद रहे की कैंपस में लेफ्ट की इस गुंडागर्दी को हर कोई ना सिर्फ देख रहा था बल्कि कई सामान्य छात्र इसकी चपेट में भी आ चुके थे जिस कारण बौखलाहट में “लेफ्ट गैंग” बहुत बुरे तरीके से फँसता दिख रहा था । अपने को फंसता देख वामपंथियों ने असली खेल खेलना शुरू कर दिया, जिसमें अचानक आयशी घोष के घायल होने की खबर आती है और साबरमती हॉस्टल में एक बार और हमला होता है, जिसमें बोला गया की ये हमलावर बाहर से आये थे। यानी साबरमती में दूसरी बार हमले का मकसद था दोपहर से हो रही हिंसा पर पर्दा डालना, ये दिखाना कि हमलावर बाहरी थे और गेम को “भीतरी छात्रों और बाहरी गुंडों” में बदल देना। मीडिया के चमकते कमरे सिर्फ यूनियन प्रेसीडेंट के जख्म तक ही कवर कर पाये और घायल अन्य दर्जनों छात्रों के बहते खून को अंधेरे मे दबा दिया गया। मीडिया से लेकर अकेडेमीया, लुटियन्स से खान मार्केट तक बस एक ही नरेटिव चलने लगा, जो वामपंथी चलाना चाहते थे।

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वामपंथी राजनीति का आधार है हिंसा

वामपंथ और हिंसा वैसे ही हैं जैसे कोई व्यक्ति और उसकी परछायी। इन्हें अलग करना बेमानी होगा। स्थान-काल और परिस्थितियों के साथ मार्क्सवाद के अनेक रूप सामने आये परन्तु हिंसा सबके मूल में किसी ना किसी रूप में विद्यमान रही। सोवियत रूस हो या क्यूबा या चाईना या भारत में पश्चिम बंगाल या आज का केरल हर जगह वामपंथी हिंसा को राजनैतिक संरक्षण दिया गया। माओ के कथन “राजनैतिक सत्ता बन्दूक की गोली से निकलती है” को इनकी सरकारों ने चरितार्थ कर दिखाया। जेएनयू मे हुई हिंसा को लेकर सभी एक राय हैं कि कैंपस मे ऐसा पहली बार हुआ है लेकिन लोग यह भूल रहे हैं की कई सालों बाद एसएफआई यूनियन की टॉप मोस्ट पोज़ीशन पर काबिज है। यह वही एसएफआई है जो देश भर के शिक्षण संस्थानो में अपनी हिंसक गतिविधियों के लिये जानी जाती है।

इस साजिश के असली मंसूबे

यह सबको पता है की पिछले कई सालों से जेएनयू छात्रसंघ पर वाम संगठनों का कब्जा है। 2014 में देश मे आयी मोदी लहर और 2016 में कैंपस में हुई देश – विरोधी घटना ने कैंपस के वामपंथियो के चेहरे पर लगा नकाब हटा दिया था। पूरा देश इनकी, मोदी तथा भारत विरोधी मानसिकता वाले अर्बन नक्सल के रूप में पहचानता है। जो समय-समय पर देश की सत्ता को बदलने की भरपूर कोशिश करते हैं, इसके लिये वे किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। जेएनयू कैंपस भी 2016 के बाद लगातार किसी ना किसी तरीके से ऐसे लोगों के राजनैतिक षड़यन्त्रो का शिकार होता रहा है।  2019 के चुनावों मे मिली शानदार जीत के बाद, समान्य जनता के बीच मुंह की खा चुके विरोधी दल अब देश के शिक्षण संस्थानो और छात्रों और युवाओं को दिग्भ्रमित करने की पूरी कोशिश कर रहा है। जिस पर कई वामपंथी विचारकों के लेख भी प्रकाशित हुये कि अब देश में विपक्ष की भूमिका मे छात्रों को आना होगा। पहले जामिया फिर एएमयू और अब जेएनयू कैंपस मे खड़ा किया गया विवाद विपक्ष की बहुत बड़ी रणनीति का हिस्सा है। इसे किसी फ़ीसवृद्धि जैसे मुद्दे तक सीमित समझ लेना देश के लिये बहुत बड़ी भूल हो सकती है। जेएनयू की यह घटना तब होती है जब जामिया आन्दोलन शांत पड़ चुका है, देश की जनता CAA और NRC की भ्रांतियों से बाहर निकल चुकी है। इस घटना के  कुछ मिनट के भीतर जेएनयू गेट पर राजनैतिक दलों का जमावड़ा होना, प्रियंका गाँधी का तत्काल एम्स पहुँच जाना, अरविंद केजरीवाल से लेकर राहुल गाँधी और पाकिस्तान के आसिफ गफूर का ट्वीट, डी राजा, सीताराम येचुरी, कन्हैया कुमार का जेएनयू में पहुंचकर सभाएं करना, मुबई में फ़्री कश्मीर के पोस्टर लेकर प्रदर्शन करना, यह बताने के पर्याप्त है की ये साजिश किसी व्यक्ति को नही पूरे देश को चोट पहुंचाने के लिये रची गयी थी। इस घटना को लेकर लाहौर में हो रहा प्रदर्शन बहुत कुछ कहता है।मीडिया और सिनेमा के  क्षेत्र से पूरे देश की मोदी विरोधी टीम का सक्रिय हो जाना और सीधे छात्रों की लडाई के लिये मोदी सरकार को जिम्मेदार बताना, यह स्पष्ट करता है की ये मोदी सरकार और देश के खिलाफ विपक्ष की एक सोची समझी साजिश है,जिसे सभी को समझने की जरूरत है।

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( लेखक अंतर-राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान, जेएनयू में शोध अध्येता हैं । ये लेखक के निजी विचार हैं ।)

 

 

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