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जेएनयू की जनवरी 2020 की हिंसा में छिपा है वामपंथ का असली चेहरा

शिवम चौरसिया

जेएनयू में 3 से 5 जनवरी ,2020 के बीच घटित हिंसा एक सोची समझी साज़िश थी। वामपंथ जहां कहीं भी सत्ता में रहता है वहां लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाते हुए अधिनायकवादी तथा तानाशाही रवैए अपना लेता है। जेएनयू के परिप्रेक्ष्य में उपर्युक्त बात पूरी तरह से सिद्ध होती है, जेएनयू के वामपंथी गिरोह में बौखलाहट अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद तथा भारतीयता केन्द्रित विचारों की बढ़ती हुई लोकप्रियता और स्वीकार्यता से उत्पन्न हुई है। यहां यह बात उल्लेखनीय है कि वामपंथी अपने तथाकथित गढ़ में किसी और विकल्प या अन्य विचारधारा को सहन नहीं कर सकते ,जब भी विकल्प उभरता है तो उसके दमन का अराजक प्रयास शुरू हो जाता है। हालांकि वामपंथी, स्वयं को विश्वविद्यालय कैम्पस में सबसे बड़े उदारवादी और मानवतावादी जैसा पेश करने की कोशिश करते हैं परंतु जब भी उनकी विचारधारा पर कोई सवाल उठाता है या उन्हें छात्रसंघ या शिक्षक संघ जैसे चुनावों में कोई संकट नज़र आता है तो उनका हिंसक तांडव‌ शुरू हो जाता है।

जेएनयू में बीते वर्षों में छात्रों तथा शिक्षकों के मानस में व्यापक परिवर्तन हुआ है तथा उनके बीच राष्ट्रीय विचारों की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी है। जेएनयू के पिछले कुछ वर्षों का विवरण अगर देखा जाय तो हम पाते हैं कि 9 फरवरी 2016 की ‘आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाने’ संबंधी घटना से जेएनयू के वामपंथ का असली चरित्र व्यापक तौर पर देश के सामने आया। बाद के वर्षों में जैसे-जैसे अभाविप के कार्यकर्ता वामपंथ के वास्तविक चरित्र को देश तथा जेएनयू के छात्रों के सामने लाने लगे, उसके बाद से ही वामपंथ के कथित गढ़ की दीवारें दरकने लगी। कुछ वर्षों पूर्व जहां आईसा ,एसएफआई,एआईएसएफ जैसे विभिन्न वामपंथी छात्र संगठन एक-दूसरे के खिलाफ लामबंद हुआ करते थे, वो अब गिरोह बनाकर अपने अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

लेफ्ट विचारधारा से सम्बद्ध छात्र संगठन छात्र संघ के माध्यम से कैम्पस को अपनी पारिवारिक सम्पत्ति समझते थे, परंतु अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के निरंतर मजबूत होने की प्रक्रिया में जेएनयू के छात्रों ने वामपंथ की निरंकुश प्रवृत्ति का मुहतोड़ जवाब दिया है। इसलिए वामपंथियों को अपनी जमीन खिसकती देखकर उनकी बौखलाहट और हिंसक प्रवृत्ति और बढ़ गयी है। उसी का नतीजा यह है कि वे अपनी जमीन बचाने के लिए गैरकानूनी और अनैतिक हथकंडे अपना रहे हैं । यदि हम वामपंथी इतिहास की तरफ मुड़कर देखते हैं तो स्पष्ट ही पाते हैं कि इनका अतीत रक्त-रंजित कारनामों से भरा पड़ा है चाहे वह चीन, रूस या युगाण्डा हो ,इन देशों मे इनके अधिनायकवादी शासक नर-संहार कर सत्ता पर काबिज हुए। इन साम्यवादी शासन वाले देशों के वामपंथी शासक अपने-अपने कालखंड में निरंकुश शासक के रूप में जाने गए । इनके खिलाफ उठने वाली हर लोकतांत्रिक आवाज को या तो दबा दिया गया या फिर उसका दमन कर दिया गया। इसी प्रकार भारत में भी इनका इतिहास वर्ग संघर्ष और नरसंहार से भरा पड़ा है  और भारत के विभिन्न प्रान्तों जैसे कि केरल, बंगाल तथा त्रिपुरा में सत्ता में आए वामपंथियों का रक्त-रंजित इतिहास हिंसा का वीभत्स उदाहरण है।

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जेएनयू के इतिहास में भी वामपंथी हिंसा के कई डरावने उल्लेखनीय उदाहरण है जो की इनके असली चरित्र की पुष्टि करते हैं। यहाँ के एलुमिनाईओं के ज़ेहन में आज भी वामपंथी अत्याचार के भयवाह दृश्य जीवंत हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में 1983 की घटना उल्लेखनीय है जिसमें तत्कालीन कुलपति के घर में घुसकर वामपंथियों ने भारी हिंसा की तथा हॉस्टल वार्डनों के घर पर में भी तोड़फोड़ की। उसी तर्ज पर 5 जनवरी 2020 की घटना को वामपंथियों द्वारा अंजाम दिया गया। यद्यपि घटनाक्रम की शुरुआत फीस वृद्धि के खिलाफ आंदोलन के नाम पर शुरू हुई थी, जो कि जेएनयू के आम छात्रों के हक का मुद्दा था, जेएनयू के छात्रों के एक बड़े तबके के अस्तित्व का प्रश्न था, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए इस निर्णय की खिलाफ सरकार का विरोध भी किया और जेएनयू से लेकर यूजीसी तक सड़क पर प्रदर्शन किया। अभाविप के समस्या से समाधान के सिद्धांत के अनुरूप परिषद के कार्यकर्तओं ने यूजीसी, शिक्षा मंत्रालय जेएनयू प्रशासन के खिलाफ आम छात्रों के साथ कंधे से  कंधा मिलाकर विरोध प्रदर्शन किया और अंत में इस समस्या का समाधान हुआ। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इस पूरे आंदोलन का हिस्सा रही लेकिन परिषद के विरोध का तरीका संवैधानिक मर्यादाओं में रहा। परंतु वामपंथी छात्र संगठनों के विरोध का तरीका और उस दौरान के घटनाक्रम से ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसके मंसूबे कुछ और थे। इस पूरे प्रकरण में वामपंथियों ने पहले देर रात हॉस्टल वार्डन के घर का घेराव किया, फिर महिला प्रोफेसर को 30 घण्टे तक क्लास रूम में बंद करके रखा गया और उस बीच उनको मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। हद तो तब हो गयी जब एक गर्भवती महिला प्रोफेसर के घर का घेराव इतने गैर मर्यादित आचरण से किया गया कि उनको देर रात पुलिस की सहायता लेनी पड़ी। इन सब घटनाक्रमों में उल्लेखनीय यह है कि ये सब कृत्य करने वाला गैंग अपने को महिला सशक्तिकरण और महिलावाद के मसीहा होने का दावा करता है। 5 जनवरी 2020 की घटना से वामपंथ की हिंसक, अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक प्रवृत्ति और पद्धति प्रदर्शित होती है। जैसा की शुरुआत में वामपंथी छात्र संगठनों ने क्लास बहिष्कृत करने का फतवा जारी किया, उसके उपरांत परीक्षा बहिष्कृत करने का फतवा भी और अन्त में बौखलाहट में वामपंथियों ने रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया का बहिष्कार किया, बॉयकॉट करने के तुगलकी फरमान जारी किए। लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा चुका था,आम छात्र इनके कुत्सित इरादों और मंसूबों को समझ चुका था और अपने करियर और भविष्य को ध्यान चिन्ता करते हुए अपनी रजिस्ट्रेशन प्रकिया पूरी कर रहा था लेकिन वामपंथी अपनी प्रवृत्ति और चरित्र से ही निरंकुश होते हैं और अपने फतवों की अवहेलना नहीं सहन कर सकते।

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जेएनयू में वामपंथी हिंसा की प्रदर्शनी लगाते एबीवीपी जेएनयू के कार्यकर्ता
जेएनयू में वामपंथी हिंसा की प्रदर्शनी लगाते एबीवीपी जेएनयू के कार्यकर्ता

वामपंथियों ने संचार और सूचना सेवा केंद्र (सर्वर रूम) जहां से विश्वविद्यालय की ऑनलाइन गतिविधियाँ संचालित होती हैं , वहां पर तोड़फोड़ की उसको हाईजैक करके वहां बैठ गए,जिसके फलस्वरूप जेएनयू की संचार प्रक्रिया बाधित हो गई परंतु बात यहीं खत्म नही होती है, प्रशासन के द्वारा वैकल्पिक रजिस्ट्रेशन व्यवस्था की गयी जिससे रजिस्ट्रेशन प्रकिया पुनः शुरू हुई और सभी छात्र पुनः रजिस्ट्रेशन करना प्रारम्भ किये। लेकिन वामपंथी छात्र संगठन अपना हिंसक रंग दिखाते हुए आम छात्रों को बलपूर्वक जेएनयू के अलग-अलग स्कूलों और सेन्टरों में जाने से बलपूर्वक रोकने लगे और कुछ छात्रों से मारपीट भी की। तब आम छात्रों ने विद्यार्थी परिषद से सहायता मांगी, विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता उन छात्रों की आवाज बनकर खड़े हुए और पठन-पाठन के वातावरण को बहाल करने का प्रयास करने लगे और विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं को आम छात्रों की आवाज बनना वामपंथियों को सहन‌ नहीं हुआ। इसके उपरांत वामपंथी अपने प्रवृत्ति के अनुरूप विरोध की आवाज को दमन करने का निश्चय किया। और फिर वो 5 जनवरी के दिन का भयावह दृश्य व्यक्त करने में भी सिरहन हो जाती है। 5 जनवरी का दिन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के लिए वामपंथियों की हिंसा भरा था। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक-एक कार्यकर्ता के छात्रावास और रूम को पहचान कर बुरी तरह से पीटा गया। परिषद की विचारधारा से सहमति रखने वाले हर व्यक्ति चाहे वह छात्र, शिक्षक या दुकानदार ही क्यों न हो सभी को यातनाएं झेलनी पड़ीं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के समर्थक छात्रों से बुरी तरह मारपीट की गई। बात यहीं नहीं खत्म होती है मारपीट के बाद कार्यकर्ताअों का हॉस्टलों भोजनालयों आदि से सामाजिक बहिष्कार किया गया और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की छात्रा कार्यकर्त्ताओं के फ़ोन नंबर गलत तरीके से शेयर किए गए जिसके कारण उन सभी को अश्लील फ़ोन कॉल और संदेश भेजकर मानसिक रूप से प्रताड़ित होना पड़ा।

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वामपंथियों की ये ओछी हरकतें तथा हिंसक प्रवृत्ति कैंपस के वातावरण के खिलाफ हैं, विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में वामपंथी विचारधारा के कारण आम छात्रों को नियमित यातनाएं सहनी पड़ती है, हमारे कैंपसों को यदि सुरक्षित करना है, उन्हें रचनात्मक बनाना है तो वामपंथियों की अलोकतांत्रिक तथा तानाशाही रवैए के खिलाफ में एकजुट होना पड़ेगा।

( लेखक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जेएनयू इकाई के अध्यक्ष हैं तथा 5 जनवरी 2020 की हिंसा में वे बुरी तरह घायल हुए थे।)

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