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“सब जग होरी, जा ब्रज होरा”

बृज के रंग में रंगने वाले पर पुनः कोई और रंग नहीं चढ़ता और बात जब होली की हो तो कहा जाता है, “सब जग होरी जा बृज होरा…”। आमतौर पर होली दो दिन यानि होलिका दहन और धुलेंडी के रूप में मनाई जाती है परन्तु हमारे बृज में होली 40 दिन की होती है।बृज में रंगों की होली के साथ-साथ फूल, लड्डू,माखन,लठ्ठ,छड़ी आदि अनेकों प्रकार से होली मनाने का प्रचलन है। जहां वृंदावन में रंगों व फूलों की होली प्रसिद्ध है तो वहीं बरसाने और नन्दगाँव में लट्ठ और छड़ी के साथ होली मनाई जाती है। होली से पहले फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन बरसाना में लड्डू होली होती है जिसमे भक्तों को प्रसाद के रूप में लड्डू बांटे जाते हैं। नवमी के दिन नंदगाँव के ग्वाले बरसाना की गोपियों के साथ होली खेलने आते हैं, जहां बरसाना की गोपियाँ उन पर लट्ठ बरसाती हैं।अगले दिन दशमी को बरसाना के ग्वाले होली खेलने नंदगाँव जाते हैं। माना जाता है श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ किशोरी जी के बरसाना होली खेलने जाते थे जहाँ सभी गोपियाँ उन पर लट्ठ बरसाया करती थी,इसी प्रथा का प्रचलन आज भी बरसाना और नंदगांव में है।

लगभग एक महीने तक चलने वाले इस बृज के सबसे बड़े महोत्सव का शुभ आरंभ होता है माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर जिसे “वसंत पंचमी” भी कहा जाता है। वसंत पंचमी के दिन ही वृंदावन में रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी महाराज के लाडले ठाकुर श्री बाँके बिहारी जी महाराज को प्रथम गुलाल लगने के साथ सम्पूर्ण बृज में होली का शुभारंभ हो जाता है।

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वसंत पंचमी से 40 दिन तक श्री बिहारी जी के गालों पर विशेष गुलाल लगता है जिन्हें “गल्लचप्पे” भी कहा जाता है।ठाकुर जी को रंग लगने के बाद सेवायतों द्वारा प्रसाद के रूप में भक्तों पर रंग लुटाया जाता है।वृंदावन के साथ बृजक्षेत्र के अन्य भागों यानि गोकुल, बरसाना, नंदगांव से लेकर मथुरा व बृज क्षेत्र में आने वाले विभिन्न गावों में भी विशेष रूप से होली मनाई जाती है।

वर्ष भर सबको ठाकुर श्री बाँके बिहारी जी की फूलों वाली होली की प्रतीक्षा रहती है।इस वर्ष वृंदावन में 20 मार्च यानि “रंगभरनी एकादशी” पर श्री बिहारी जी अपने भक्तों के साथ फूलों की होली खेलेंगे। एकादशी के दिन सबसे पहले सेवायत गोस्वामी ठाकुर जी के साथ होली खेलते हैं जिसमे वह ठाकुर जी को गुलाल लगाते हैं। साथ ही, पिचकारी के द्वारा ठाकुर जी की सफ़ेद पोशाक को केसर के छींटों से भर देते हैं। इसके बाद शुरू होती है “फूलों की होली” जब मंदिर में हर तरफ बस फूल ही फूल उड़ते हैं। “राधे-राधे” के जयकारों के साथ श्रद्धालुओं की भीड़ ठाकुर जी की एक झलक लेने को आतुर रहती है, और सेवायतों द्वारा भक्तों पर प्रसादी गुलाल व केसर और टेसू युक्त रंग डाला जाता है। पांच दिवस के इस उत्सव में ठाकुर जी को भोग भी विशेष लगता है, गुजिया व अन्य मिठाईयों के साथ-साथ चाट भी भोग लगाई जाती है। होली के अंतिम दिन शाम में श्री बिहारी जी “गुलाबी छटा” में दर्शन देते हैं।

बृज की होली धार्मिक पक्ष के साथ ही बृज का सांस्कृतिक पक्ष भी उजाकर करती है। “मोहन प्रात ही खेलत होरी। चोबा चंदन अगर कुंकुमा, केसरि अबीर लिये भरि झोरी॥”, “मेरी चुनरी में पड़ गयो दाग री, कैसो चटक रंग डारो” या फिर “आयो नंदगांव से होली खेलन नटवर नंद किशोर”, के सुरों से बृज का वातावरण गूँज उठता है। होली के उत्सव में विभिन्न मंदिरों में समाज गायन होता है जिसमे गोस्वामी समाज व अन्य समाजों व परिवारों के लोग भाग लेते हैं| बृज में राग सेवा की प्रधानता होने के साथ विशेष रूप से यहाँ का “रास” और “फाग” प्रसिद्द है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी श्रद्धा भाव से ठाकुर जी और किशोरी जी को रिझाने के लिए गाते हैं।

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“हमारे बृज में माना जाता है कि जो प्रेम से यहाँ होली खेलता है ठाकुर जी उसे स्वयं रंग लगाने आते हैं|”

(लेखक, ठाकुर श्री बाँके बिहारी मंदिर, वृंदावन के श्रीअंग सेवी हैं।)

 

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