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पुस्तक समीक्षा : राष्ट्रीय विमर्श का आह्वान

हम जानते है कि शौर्य का सम्मान हमारी परंपरा रहा है। अहिंसामुलक जीवन दृष्टि में न्याय युद्धों की स्वाभाविक महिमा रही है क्योंकि ऐसे युद्ध विकट और विकराल हिंसा का नाश करते हैं और तभी अहिंसा का लोक प्रवाह गतिशील रह पाता है राजाओं में परस्पर युद्धों की मर्यादा क्षात्रतेज एवं सामाजिक शौर्य को जागृत रखें रही ।
विक्रांत खंडेलवाल

सन 2001 में पंडित रामेश्वर प्रसाद मिश्र द्वारा लिखित “राष्ट्रीय विमर्श का आह्वान” पुस्तक  पढना प्रारंभ किया है। प्रोफेसर रामेश्वर प्रसाद मिश्र ,काशी हिंदू विश्वविद्यालय में दर्शन शास्त्र एवं गांधी  चिंतन के प्रोफेसर हैं ।इस पुस्तक का प्रकाशन ग्रंथ अकादमी के द्वारा किया गया है लेखक ने इस पुस्तक में  भारतीय विचार परंपराओं के संघर्ष और समाधान का बोध करवाया गया है इस  विषय को बहुत ही अच्छे उदाहरण देकर के और अच्छे ढंग से अच्छे शब्दों में लेकिन गहरे शब्दों में बताया गया है समझने में एक बार जरूर थोड़ी दिक्कत होगी लेकिन फिर भी आप जैसे विचारको के लिए, प्रचारकों के लिए और चिंतन करने वाले लोगों के लिए इसका ज्ञान बहुत ही आवश्यक है। इसलिए इस पुस्तक को पढ़ने के बाद कुछ  अंश आप तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं जैसा कि शीर्षक है – “राष्ट्रीय विमर्श का आह्वान ”

हम सभी जानते है कि भारतीय समाज में एक आंतरिक उथल पुथल  है। स्वाधीनता के इतने वर्षों के बाद भी यह उत्तल पुथल स्वाभाविक ही है। औपनिवेशिक ढांचे की सीमाएं दिनोंदिन स्पष्टतर होती जा रही है और ये  ही आंतरिक असंतोष विक्षोभ ,व्यग्रता  एवं हताशा  का कारण बन रही है किंतु उनका सहज क्रम में स्थान लेने वाली स्वस्थ स्वदेशी संस्थाएं उभरती नहीं दिख रही है। स्वदेशी संस्कार तो भी भरपूर है, स्वदेशी आकांक्षाएं भी कम नहीं है उत्साह है, उमंग है, लालसा है ,आत्म गौरव भी है और अपनी पहचान की छटपटाहट भी… परंतु स्वदेशी सृजनशीलताऐ सहज रूप से प्रकट नहीं हो पा रही है एक सामान्य गति से समाज में तो यह प्रक्रिया निर्बाध चलती है और उसे ही परंपरा प्रवाह कहा जाता है किंतु भारत वैसा सहज, स्वस्थ समाज नहीं रह गया है विगत 1200 वर्षों से निरंतर बर्बरता आततायी प्रहारों के विरुद्ध प्रबल संघर्ष से यह क्षेत्र क्षत विक्षित होता  रहा है अतः वर्तमान स्थिति और उसमें अंतर्निहित संभाव्यताओं को ऐतिहासिक संदर्भ में देखना ,समझना होगा ।

यह समझना ही बौध साधना है यह सत्य है कि भारत सनातन धर्म की साधना का देश है। मनुष्य का कर्तव्य उसके स्वस्थ स्वरूप का बोध प्राप्त करना, सम्मान करना ,उससे अपना स्वस्थ संबंध रखना ,आदान-प्रदान का समुचित ध्यान रखना तथा प्रकृति लेने को ऋण स्वरूप समझकर उस ऋण को चुकाने का ध्यान रखना ।  इसलिए यदि कोई व्यक्ति विचार विशेष को ही जीवन का एक मात्र सत्य मान ले तो उस विचार के प्रति उसका विवेक मंद पड़ जाता है और तीव्र राग की अधिकता हो जाती है। ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति वैसे ही श्रेयकर विचारों के प्रति अवमानना या विद्वेष पाल लेगा । यह तो धर्म नहीं है, अधर्म हो जाएगा ।

इसी प्रकार शक्ति, सौंदर्य ,पवित्रता , श्रेष्ठता आदि को केवल अपनी या अपने पंथ ,मत ,संप्रदाय की धारणाओं को ही एकमात्र सत्य मान लेने पर शक्ति ,सुंदरता पवित्रता और श्रेष्ठता के अन्य रूपों के विनाश की योजनाएं लोग बनाने लगते हैं यह तो पापा-चरण है जैसा कि ईसाइयत , इस्लाम, मार्क्सवाद और यूरोपियन श्रेष्ठतावाद  के नाम पर दूसरे समाजों ,राष्ट्रों  एवं कौमो  पर जो अपनी धारणाएं इसी प्रकार थोपी गई और इसे ही दूसरों की जहालत मिटाना ,प्रकाश फैलाना ,दूसरों को विकसित करना तथा सभ्य बनाना कहा गया , यह सब घोर पाप है। पहले तो यह सब बलपूर्वक किया जाता था अब वही काम इन दिनों मैत्री का प्रदर्शन करते हुए किया जाता है।

हम जानते है कि शौर्य का सम्मान हमारी परंपरा रहा है। अहिंसामुलक जीवन दृष्टि में न्याय युद्धों की स्वाभाविक महिमा रही है क्योंकि ऐसे युद्ध विकट और विकराल हिंसा का नाश करते हैं और तभी अहिंसा का लोक प्रवाह गतिशील रह पाता है राजाओं में परस्पर युद्धों की मर्यादा क्षात्रतेज एवं सामाजिक शौर्य को जागृत रखें रही । वस्तुतः  ऐसे युद्ध गंभीर वैचारिक विमर्शों  में होने वाले वैचारिक द्वंद्वों की तरह ही उपयोगी ,बलवर्धक और आवश्यक होते हैं वे क्षात्रबल की  साधना के अंग होते हैं शौर्य एवं सैन्य बल की धर्ममयी प्रवृत्ति के प्रति जागृत सम्मान भाव भारतीय मनीषा का अभिन्न अंग है ।  ममेश्वरवाद या एकदेववाद घोर तमस है  परमसत्ता के विराट पर वैविध्य के  बौध के विपरीत बौद प्रवाह “मोनीथिज्म”  यानी एकदेववाद या एकपंथवाद ।

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वस्तुतः  ममेश्वरवाद है अनंत कोटि प्राणियों में से केवल मुझ एक की ही सर्वव्यापी परम सत्ता संबंधी समझ सही है यानी वह जो  विराट ऐश्वर्य विस्तार है इसका एक चित्रांश में हूं उस विराट की मेरी ही है व्याख्या सबको माननी पड़ेगी । यह कहना और मानना ममेश्वरवाद है यही मोनोथिज्म है परम ऐश्वर्य संपन्न विराट सत्ता का केवल मेरा ही प्रतिपादन एक मात्र सत्य है केवल मेरे ऐश्वर्य सम्पन्न  द्वारा प्रतिपादित पूजा रूप और अवधारणा रूप सत्य हैं शेष सब झूठ है यह दावेदारी ही ममेश्वरवाद  है।

मोनोथिज्म को मौनिज्म  केवल मूर्ख लोग समझते हैं अतः उस पर कुछ कहना व्यर्थ है मोनो  का अर्थ है एकमात्र या अकेला । ‘थी’ का अर्थ है ईश्वर संबंधी विवेचना विश्वास या ईमान । ‘थी ‘ का अर्थ ईश्वर नहीं ईश्वर संबंधी मान्यता होती है अतः मोनिथिज्म का अर्थ वह दावेदारी कि  ईश्वर संबंधी या परम सत्य संबंधी केवल मेरी मान्यता ,मेरी आस्था मेरा ही विश्वास मेरे ईमान सही है सही सब गलत है।

ऐसा भयंकर तामसिक उन्माद ,राक्षसी दर्प और दावेदारी ही मोनीथिज्म है जिन लोगो ने मोनीथिज्म और मोनिज्म को एक ही माना है वे या तो अज्ञानी थे या उत्साही या फिर दलाल थे। क्योंकि मोनिज्म का अर्थ अद्वेतवाद है अर्थात एकमात्र परम सत्ता ही सब जगह व्याप्त है यह दृष्टि, मत , बोध या धारणा अर्थात ” एकम सत विप्रा बहुदा वदन्ति ” अर्थात परम सत्ता एक ही है विद्वान लोग भिन्न भिन्न प्रकार से व्याख्या करते है द्वितीय कुछ नही है अतः मोनिज्म तो मोनीथिज्म का बिल्कुल उलटा है

हमारे लिये यह बार बार आत्मधिक्कार  की बात करना अनुचित है विश्व का ऐसा कोई समाज नहीं जिस पर आतताई आक्रमण न हुआ हो । अतः  व्यर्थ आत्मधिक्कार निष्प्रयोजन एवं नीराधार है किंतु विमर्श हेतु शांत मनन उपयोगी होगा ताकि कारणों का अनुसंधान होता रहे  यह भी संभव है कि इस प्रक्रिया में हजारों ऐसे  अप्रगट ,गुप्त या अज्ञात आध्यात्मिक,  सांस्कृतिक प्रयासों , पुरुषार्थो की जानकारी हो जाए जिनके बल पर भारत में इस्लाम का प्रचंड प्रवाह थामा जा सका , रोक दिया गया ।  ऐतिहासिक तथ्य है कि हम इन बर्बर , अनीतिमय आक्रमणों  से सतत संघर्ष किया और 1000 वर्ष तक इस्लामी एकदेववादी आक्रमण एवं दबाब का प्रतिकार भारतीय मनीषा तथा क्षात्रतेज ने किया है ।

प्रत्येक युद्धरत समाज टूटता है हम भी टूटे , थके । हमारी उसी आहत अवस्था में इस्लामी समाज से विश्व में टक्कर लेता ईसाई साम्राज्यवाद हमारे यहां तक आ पहुंचा ।  यद्यपि इस्लामी आतताइयों  की तुलना में ईसाई आताताइयों के अनाचार भिन्न कोटि के रहे , पर एक आहत समाज के प्रतिकार के सामर्थ्य की तुलना में वे भी प्रचुर ही थे ।  यदि हमारी पहली टक्कर सीधे ब्रिटिश साम्राज्यवाद से होती तब स्थिति नितांत भिन्न होती तब देश का बौद्धिक क्षय इतना  भयावह नही हुआ होता  है ।  तब ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध हमारी वीरता भिन्न रूपों में प्रकट हुई होती ।

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इन दोनों साम्राज्यवादियों  के आनाचारों के फल स्वरुप हमारा भौगोलिक परिदृश्य खंडित हुआ इस्लामी साम्राज्यवाद के आक्रमण के फल स्वरुप आज के भारत के कई हिस्से अफगानिस्तान ,पाकिस्तान, बांग्लादेश के रूप में बहुदेववादी, बहूपंथवादी , वैविध्यमूलक प्रवाह से रहित हो चुके हैं इन भागों को इस्लामी अधीनता में लाने वाली प्रक्रिया शेष भारत में आज भी गतिशील है रूहानी लोगों ,फकीरों सूफियों आदि के रूप में भारतीय धर्म भावना का दुरुपयोग करते हुए विदेशी इस्लामी दरवेश भारतवर्ष में यत्र-तत्र ठाव बनाकर रहते थे और अवसर आने पर भारत के शत्रुओं की सहायता हर प्रकार से करते थे एक ऐतिहासिक सत्य हैं जो आज भी गतिशील है अतः उस पर रोक लगानी होगी । इस्लामी दबावों में भारतीय मनीषा ने अनेक विकृतियों को जन्म दिया।  सतत संघर्षरत सामाजों  में ऐसा होना स्वाभाविक है ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने इन विकृतियों में से कई को बहुत सूक्ष्म रूप से गाढे रंग दिए तथा संस्थाबद्ध  किया ।  हमारी शिक्षाधाराओं और शिक्षा तंत्र का संपूर्ण उन्मूलन करके ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने अपना शिक्षा तंत्र फैलाया । उसमें से एक व्यवस्थित भारतघाती बोधात्मक प्रशिक्षण की प्रक्रिया विकसित हुई ।

भारत में आर्यों के आक्रमण आदि की वैज्ञानिक भाषा वैज्ञानिक परिकल्पनाओं को ऐतिहासिक सत्य स्वीकार करना , भारत को विश्व के रूप में अनोखा बताना कि यह लगातार दूसरों द्वारा पराजित किया जाता रहा है उपनिवेश बनता रहा समाज है यहां पर ” कामोपोजिट कल्चर ” की बात करना, इस भारतद्रोही बौद्ध प्रशिक्षण की प्रक्रिया का अंग है विकृतियों से मुक्त होने के लिए हमें बोध प्रशिक्षण की भारत के अनुकूल सही प्रक्रिया चलानी होगी ।

स्वाधीन भारत में ब्रिटिश ईसाई शिक्षा का एकाधिकार

यह एक भयानक तथ्य है कि स्वाधीन भारत में भी तथाकथित आधुनिकता के नाम पर ब्रिटिश ईसाई शिक्षा परंपरा का एकाधिकार स्थापित है औपनिवेशिक सत्ता हस्तांतरण प्रक्रिया  द्वारा शासक बने एक प्रभावशाली यूरोभारतीय वर्ग ने नेहरू -मौलाना ,आजाद-हुमायूं ,कबीर-नूरुल हसन, नरसिम्हा राव- अर्जुन सिंह के नेतृत्व में इस ब्रिटिश इसाई शिक्षा तंत्र का एकाधिकार स्थापित रखा और उसका प्रभाव लगातार फैलाया ।  ताकि  यूरोभारतीय कुलो के प्रति भारतीय समाज में गहरी आत्महीनजनित तामसिक श्रद्धा मजबूत  हो । गांधी जी ने जिसे सीक्रेट् फोर्स  कहा उस प्रशासनिक सेवा के कई दिग्गजों , भारतीय अफसरों की प्रभावशाली भूमिका रही फल स्वरुप भारत की राष्ट्रीय शिक्षा के लक्ष्य का निर्धारण करने के लिए एक ऐसी प्रक्रिया दीक्षित की गई इसमें राजनेता एवं प्रशासनिक अफसर ही ज्ञान के लक्षण, ज्ञान साधना की प्रक्रिया निर्धारित करते थे जो लोग अपने जीवन का अधिकांश समय कानून व्यवस्था के संचालन और लोगों को किसी मुद्दे पर एकजुट और प्रेरित करने में लगे रहते थे । उन्हें ही ज्ञान के लक्ष्य निर्धारित करने का अधिकारी मान लिया गया । फलस्वरूप  भारतीय शिक्षा का स्वरूप शासक पार्टी के पदाधिकारी एवं शासन तंत्र के अफसर तय करते थे । विगत  वर्षों में कांग्रेस के संरक्षण में मुख्यतः कम्युनिस्ट एवं अन्य वामपंथी एक्टिविस्ट किस्म के तथाकथित विद्वान ही भारत ने दर्शन , इतिहास, राजनीतिक शास्त्र, समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र आदि की शिक्षा शिक्षण पाठ्यक्रमों का स्वरूप निर्धारित करते रहे हैं समस्त शिक्षा तंत्र भी कम्युनिस्टों  के निर्देश पर चलाया जाता रहा है ” कंपोजिट कल्चर”  के नाम पर कई झूठे तथ्य प्रस्तुत किए गए , जैसे कि शिक्षा दी जाती है कि 1. भारत में आर्य बाहर से आए यद्यपि इसका कोई भी प्रमाण नहीं है यह भाषा वैज्ञानिक परिकल्पना मात्र है कोई भी ऐतिहासिक तथ्य नहीं है आक्रमण का कोई आधार नहीं है फिर भी राग अलापते रहते है

  1. भारत में आर्य आक्रमण का सिद्धांत वे यहां पर इस्लामी साम्राज्यवाद एवं ब्रिटिश साम्राज्य के लक्ष्य को आगे जारी रखने के लिए रचते हैं।
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2.पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुत्व ,बौद्ध धर्म आदि को इस्लाम के समान अधिकार मिले इतनी सी मानवाधिकार वाली बात तक यह लोग भारतद्रोही कभी नहीं कहते ।

3. संसार के अनेक देशों में ईसाइयत और इस्लाम स्थापित करने को इन्होंने अपना राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित कर रखा है इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है इनका लक्ष्य एक ही है भारत के राष्ट्रीय लक्ष्यों के निर्धारण में हिंदुत्व की कोई भूमिका न हो यही उनकी मुख्य चिंता है।

इस प्रकार इनके द्वारा भारत का यूरो ईसाईकरण  ही चुनौती के रूप में , लक्ष्य के रूप में रखा जाता है भारत स्वधर्म का त्याग करें , यही मानो भारत का बहुत बड़ा पुरुषार्थ बताया जाता है

हम से यही अपेक्षा की जाती है यदि हम संस्कारवस सर्वथा धर्मविहीन न हो पाए तो इसके लिए हम स्वयं ही स्वयं को ही  निरंतर  धिक्कारते रहे , हीनता  से भरते रहे । श्रेष्ठ संस्कारों की मूलभूत प्रेरके प्रज्ञा की साधना का ध्यान हमें कभी ना हो पाए इस प्रकार भारतीय परंपरा से जुड़े हिंदुओं का अधिकाधिक  अहिंदूकरण हो , उनमें विजतीयता  एवम विधर्म का प्रसार हो , इसी पर बल देना इस बोध प्रवाह का मुख्य उद्देश्य एवं कर्तव्य हो गया हैयहां सेकुलरपंथियो  का उद्देश्य वस्तुतः वृहत भारतीय समाज को भारतीय संस्कारों से यथासंभव मुक्त कर उन्हें अपने अनूप रूपांतरित करते हुए अधीनता में रखना है वस्तुतः सेकुलरपंथी हिंदू लोग “नान बिलीव इन हिंदू “है  । हिंदुत्व में इन्हें श्रद्धा नहीं , विद्वेष , दुर्भाव है भौतिक स्तर पर यह सेकुलरपंथि लोग भारतीय राज्य में हिंदुओं को मात्र वोट की हिस्सेदारी समझते हैं हिंदुओं में स्वाधीनता का स्वाभाविक आत्म गौरव न उभरने देना इस मानसिक त्रास का लक्ष्य है ।

समकालीन विश्व में निर्णायक शक्ति संहार-शक्ति ही है वृहत भारतीय समाज के प्रबुद्ध जनों को विश्व स्तर पर आततायीयों की शक्ति का स्वरूप भी समझना होगा तथा आहतों के बल का आधार भी जानना होगा।  प्रबंध सैन्य शक्ति एवं आणविक संहारक-शक्ति तथा विश्वव्यापी अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण और विश्व के साधन स्त्रोतों के उल्लेखनीय अंश को अपने नियंत्रण में रखने हेतु रचित प्रौद्योगिकी तंत्र एवं अर्थ तंत्र ही आतताइयों का मुख्य मौलिक बल है साथ ही इस प्रबल सुदृढ व परिष्कृत विश्वव्यापी विद्याधारा का अंतरराष्ट्रीय संगठन उसका बौद्धिक अंग है ।

ईसाइयत का बौद्धिक  जाल पहचानने की जरूरत है

इसाई आज “थिअरी आफ फुलफिलमेंट ” के सूक्ष्म कुटिल सिद्धांत के विस्तृत तंत्र के अंतर्गत सक्रिय है अतः सर्वप्रथम तो हमें इस ईसाइयत के वर्तमान बौद्धिक सैद्धान्तिक आधारों , सूक्ष्म-वाक-छलो , वितंडाओ तथा  समृद्ध , कुटिल, विस्तृत व्यापक तंत्र को जानना होगा ।

विश्व की विविध संस्कृतियों को अब पहले की तरह बर्बर न कहकर पूर्वविकसित अतीत में पनपी संस्कृतियां कहते हैं उन सब की चरम सार्थकता एवम अनिवार्य परिणीति ईसाइयत में समाहित होने में मानते हैं ।  इस हेतु उनके प्रचंड भौतिक बल की बराबरी एवं प्रतिउत्तर  आवश्यक है क्योंकि यह तमस मुख्यतः बर्बर बलप्रयोग के द्वारा सफल हुआ है किंतु विवेक साधना के नाम पर शक्तिविमुखता अविवेक है सैन्यबल बढ़ाये बिना मैत्री असम्भव है इस प्रकार के ज्ञान से ही राष्ट्रीय विमर्श संभव है।  इस हेतु से  विदेशी तन और मानसिकता वाले विधर्मियों को छोड़ कर भारतीय ईसाई और मुस्लिमों से स्वस्थ तेजस्वी संवाद की दिशा बनानी होगी ।

क्रमशः

(समीक्षक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के क्षेत्रीय संगठन मंत्री (उत्तर क्षेत्र) हैं।

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